व्यवहार रोजी रोटी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिस दुकानदार के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे, अक्सर लोग उसी दुकानदार की दुकान से सामान खरीदते हैं। कई बार ऐसे ओटो बाले भी मिल जाते हैं कि मन होता है कि जब भी यात्रा करूंगा, इसी को फोन कर बुला लूंगा।

   अभी निर्मला को इस ओटो में बेठे ज्यादा समय भी नहीं हुआ पर थोड़ी ही देर में उसने निर्मला पर न जाने क्या जादू कर दिया। चुप तो बैठना वह जानता ही नहीं। बार बार जब वह निर्मला को बहन कहकर बुलाता तो निर्मला सुनकर अधीर सा हो जाती। निर्मला को ईश्वर ने दो ही कमियां दी हैं। एक रूप की कमी और दूसरा भाई की कमी। रूप की कमी तो वह दूर नहीं कर सकती पर भाई की कमी उसने दूर कर ली। न जाने उसे किसने बचपन में ही सिखा दिया। बचपन से ही भगवान कृष्ण की मूर्ति को वह राखी बांधती आयी है। भगवान से उसने भाई का रिश्ता जोड़ रखा है।

   ओटो बाला निर्मला को शहर के नजारे दिखाता चल रहा है।

  " देखो बहन। यह स्टेट बैंक चौराहा आ गया। यहां स्टेट बैंक की बहुत बड़ी ब्रांच है। यहीं से एक रास्ता धोलीप्याऊ को निकलता है। सामने से डेम्पियर नगर निकल जाते हैं। और यह रहा हमारा रास्ता। नया बस स्टैंड आने बाला है। यह देखो आ गया।" 

थोड़ा आगे बढकर ओटो बाला रुक गया।

" अब क्या हो गया भैय्या। "

  वैसे भैय्या बोलना शिष्टाचार का हिस्सा माना जाता है। पर लगता है कि बार बार बहन सुनकर निर्मला भी उस ओटो बाले को भाई ही समझने लगी। 

" हाॅ हाॅ बहन ।अभी बताता चलता हूं। यह जो कालेज देख रही हैं।" 

  निर्मला ने बाहर नजर दोड़ाई। वास्तव में एक बड़ा महाविद्यालय था। बोर्ड लगा हुआ था '  BSA डिग्री कालेज "

" अच्छा फिर "
" इसके ठीक पीछे एक इंजीनियर कालेज है। उसका नाम है BSACET, रास्ता थोड़ा आगे से है।" 

  " तो इसमें क्या बात है।" 

  " बहुत बड़ी बात है। " पता नहीं ओटो बाला क्या बात बताने जा रहा है। और जब बात पता चली तो निर्मला के मन में यही आया - खोदा पहाड़ निकली चुहिया। पर वह उसका मन गिराना नहीं चाहती है। 

" अच्छा। तो आप यह बता रहे हैं कि लेखक दिवा शंकर सारस्वत उसी इंजीनियरिंग कालेज में पढे हैं। "

" हाॅ। यही तो बता रहा हूं बहन। सन २००० से २००४ तक यहीं उन्होंने इंजीनियरिंग की थी। इसी सड़क से उनके कमरे का रास्ता था। वैसे एक मजेदार बात बताऊं। दिवा शंकर सारस्वत अभी सन २०१७ में नबंबर के महीने में मथुरा आये थे। उनकी चचेरी बहन करुणा की शादी थी। तो जानती हो बहन ।उन्हें खुद भी पहचानने में दिक्कत हो रही थी। समय बदलते ही कुछ न कुछ बदलाव तो होता ही है। पर बस स्टैंड के आगे बिहारी बेढई कचोड़ी बाले को वह तुरंत पहचान गये। उसकी दुकान से खा पीकर फिर आगे बढे थे। सही बात है कि ब्राह्मण सब भूल सकता है पर खाने का स्वाद नहीं। " ओटो बाला जोर से ही हस दिया। भले ही निर्मला अभी तक दिवा शंकर सारस्वत से परिचित नहीं है फिर भी उसे हसी आ गयी। 

  आगे बढते हुए भूतेश्वर चौराहे से गुजरे। ओटो बाले ने बताया कि यहीं मथुरा में भगवान शंकर का प्रसिद्ध मंदिर भूतेश्वर है। थोड़ा आगे बढकर ओटो ने थोड़ा बांयी तरफ रास्ता लिया और ओटो खड़े होने की निर्दिष्ट जगह पर ओटो खड़ा कर दिया। 

  " चलो बहन।" 

" अरे कहाॅ ले जा रहे हों।" 
. " अरे बहन ।मथुरा आयी हो और जन्मभूमि के दर्शन नहीं करोंगी। यह देखो। यही तो जन्म भूमि का मंदिर है।" 

  निर्मला का जन्म भूमि दर्शन करने का मन तो था। पर इस तरह तो ठीक नहीं है। कहीं ऐसा न हो कि वह दर्शन करने जाये और ओटो बाला सामान उठाकर ही चंपत हो जाये। पर ओटो बाले के पास इसका भी निदान है। सामान सामानघर में जमा कर दो। अब निर्मला को कुछ अलग लगने लगा। लगता है ओटो बाला ज्यादा ही चालाक है। इस तरह वह ओटो भी चला रहा है और गाइड का काम भी कर रहा है। इस तरह घुमाते घुमाते जब वह गंतव्य तक पहुंचायेगा फिर अच्छी खासी फीस मांगेगा। एक बार मन में आया कि इससे सख्ती से बोल दें। चुपचाप मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचा दो। पर उसकी मुस्कान देखकर सारा गुस्सा भूल गयी। विचार बदल गये। चलो वैसे भी कौन सा रोज आ पाती हूं। आज तो बस पहुचना ही तो है। 

  सामान सामानघर में जमाकर निर्मला जन्म भूमि मंदिर में प्रविष्ट हुई। बहुत ही बड़ा मंदिर है। एक आध हजार की भीड़ तो कहीं मालूम ही नहीं पड़ेगी। मुख्य मंदिर के अतिरिक्त केशवदेव जी का मंदिर, गोवर्धन महाराज का मंदिर, देवी योगमाया का मंदिर, गर्भ गृह का मंदिर निर्मला ने उस ओटो बाले के साथ घूमा। हर मंदिर के पास जाकर उसकी कहानी सुनाता। देवी योगमाया ही रुक्मिणी, द्रोपदी और नंद की पुत्री बनी थीं। पता नहीं कि उसे वास्तव में इतना ज्ञान है। लगता तो यही है दूसरे गाइडों की तरह उसने रट लिया है। 

  गर्भ गृह ही प्राचीन मंदिर का भाग है। मस्जिद गर्भ गृह से बिल्कुल सटी हुई है। निर्मला को यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि दो अलग धर्मों के पूजा गृह इतने नजदीक होने पर भी कभी कोई विवाद नहीं हुआ। दोनों ही धर्म स्थलों पर दूसरे धर्म स्थल पर हो रही आराधना का ध्यान रखा जाता है। 

मुख्य मंदिर में भगवान कृष्ण और राधा रानी की आदमकद विग्रह इतने सुंदर कि निर्मला की नजर ही उनसे नहीं हट रही। इसी मुख्य मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी का मंदिर, भगवान राम का मंदिर, भगवान शिव के पारे के शिवलिंग, माता दुर्गा का मंदिर, रामभक्त हनुमान जी के मंदिरों के दर्शन भी निर्मला ने किये। यहां एक नयी बात निर्मला ने देखी। भगवान श्री राम, माता जानकी और लक्ष्मण कुमार जी के मंदिर में भक्तराज हनुमान जी नहीं हैं। सभी स्थानों पर हनुमान जी की जगह भगवान राम के चरणों में मिलती है। पर यहां हनुमान जी भगवान श्री राम के ठीक सामने विराज रहे हैं। ऐसा लगता है कि न तो भक्त की नजर भगवान से हट रही है और न भगवान की नजर भक्त से अलग है। 

  पूरे मंदिर में भगवान की अनेकों लीलाओं के चिंत्र बने हुए हैं। ताम्रपत्र पर लिखी पूरी श्रीमद्भागवत सुरक्षित है। शायद निर्मला को लगा कि सब देख लिया। पर अभी कुछ था जो उसकी नजरों से ओझल था। 

  " अरे बहन। जरा मंदिर की छत की तरफ तो देखो।" 
ओटो बाले भाई के कहने पर जब निर्मला ने ऊपर देखो तो अपनी सुध बुध ही भूल गयी। इन्हें चित्र तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है। लगता है कि किसी भक्त की साधना से खुद ईश्वर ने अपने हाथों से इनका निर्माण किया हो। हर चिंत्र में कुछ गहरी बात छिपी थी। भगवान श्री कृष्ण का गोपियों के साथ रास। जैसे जीव का भगवान से मिलन हो रहा हो। एक चित्र में भगवान श्री कृष्ण अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन उठाये हैं। पर इससे भी बड़ी बात कि उनके सखा भी लाठियों से पर्वत को सम्हालने की कोशिश कर रहे हैं। मानों वे अपने सखा से बोल रहे हों - काना। थकना मत। हम सब भी लगे हुए हैं। इंद्र के अहंकार मर्दन में हम भी आपके साथ हैं। 

  निर्मला को अपनी माॅ के मुख से सुनी एक कहानी याद आ गयी। सेतुबंध के समय भगवान श्री राम ने एक गिलहरी की मेहनत को भी मान दिया था। बड़ा और कुछ नहीं होता। बड़ी तो होती है इच्छाशक्ति। इसी इच्छाशक्ति के बलबूते कमजोर भी बड़े से बड़ा काम कर लेता है। 

  मुख्य मंदिर के बाहर दीवारों पर संस्कृत में श्लोक और उनका हिंदी में अर्थ लिखा हुआ था। निर्मला की नजर एक वाक्य पर रुक गयी। 

  " मैं जिससे प्रेम करता हूं, उसका सब कुछ छीन लेता हूं। संसारिक सुखों में मनुष्य अक्सर मुझे भूल जाता है। पर मैं जिससे प्रेम करता हूं, उसे मुझको भूलने नहीं देता।" 

  निर्मला एकदम रुक गयी। लगता है कि यह खुद भगवान का कथन है। बात कुछ कड़वी पर सच ही है। अपने भक्तों से सांसारिक सुख छीनकर भी भगवान अपने भक्त का हित ही करते हैं। 

" यह भागवत में लिखा है। जब भगवान ने वामन रूप धरकर राजा बलि का पूरा वैभव छीन लिया था, उसी समय भगवान बृह्मा ने भगवान विष्णु से राजा बलि के प्रति कठोर बनने का कारण पूछा था। भगवान विष्णु ने यही उत्तर दिया था।" 

  एक ओटो बाले ने कब भागवत पढी होगी। जो भी है, बात बहुत गूढ है। जन्मभूमि के पूरी तरह दर्शन करने में लगभग एक घंटा लग गया। फिर निर्मला उसी ओटो बाले के साथ आगे की मंजिल के लिये चल दी। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'