एक अनजानी जगह में मैं आ गई
न मिलती मेरी सोच किसी से
मैं बस अपने सजन को भा गई
एक अनजानी जगह में मैं आ गई।
मन मेरा तितली जैसा जो
पँख फैलाकर उड़ना चाहे
पैरों में जंजीर पड़ी है जो
रस्मों में मुझको बाँधना चाहे
कभी इठलाती थी मैं भी
कभी बलखाती थी मैं भी
अब चलने में सोच के कदम बढ़ाए
जहां सबकी नजरें भी मुझपर आएँ
कभी इधर गिरी कभी उधर गिरी
चुनरी नही कभी मेरी टिकी
अब पल्लू सिर से उतर न पाए
चाहे गर्मी में जान भी जाए
कभी ये खाना कभी वो खाना
कभी नही सोचा कितना खाना
अब सोच-सोच कर सब कुछ खाए
कैसे खुद की आदत बदली जाए
उठकर करवट बदल बदल
घड़ी को देख फिर आँखें बंद
अब एक ही आवाज में आँखे खुलती
नींद भी डरकर घर अपना बदलती
जिसे नही पसन्द सलवार कमीज
जिसे हर पल जीन्स में रहना भाए
अब जीन्स को रखकर लोक में अपने
नए-नए वो सूट सिलवाए
फिर भी हँसती नही है थकती
औरों पर अपना प्यार लुटाए
देख कर अपने साजन को
दिन भर की थकान पल में मिटाए
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