मुझे अपनी रौ में बहने दो!!
स्नेह की छांव जो छूट गई;
वक्त की धारा में सूखे पत्तों संग
कहीं खो गई~
उनके अमिट निशां
ढूंढने दो!!
मुझे अब स्वयं को तराशने दो;
जूझने दो ~
खुद से;
उलझे विचारों को सूत्रमय करने दो !!
मन का खोया राग ढूंढने दो;
मुझे अपनी पहचान को
एक नये रूप में गढने दो!!
अपनी अस्मिता को
पृथक एक आयाम
में ढालने दो!!
मुझे अपने आप में होने दो!!
तुम्हारे छांव से अलग
अब एक नई रूप- रेखा खींचने दो!!
✍ डॉ पल्लवी कुमारी"पाम "

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