कर्तव्यों की जंजीरों में बंधा मैं विवश हूं।
इस वसुधा का निवासी मैं एक पुरुष हूं।।

मैं अपनी जिम्मेदारी निभाता चला गया।
अपने मन को अंतर में दबाता चला गया।।

संवेदनाएं दबा दीं मैंने कर्तव्यों को अपनाया।
त्याग मैं करता रहा फिर भी दोषी कहलाया।।

जीवन पथ पर चलने वाला अपूर्ण निष्कर्ष हूं।
अपनी इस धरती का वासी मैं एक पुरुष हूं।।

बचपन में सबने सिखाया कि तुम कभी रोना नहीं।
अंतर में अपने संवेदनाएं को एकदम बोना नहीं।।

बचपन से मुझको यही सब बताया गया।
मेरे अंतर मन को शिला सा बनाया गया।।

जीवन की राहों पर चलने वाला पथिक हूं।
अपनी इस धरा का वासी मैं एक पुरुष हूं।। 

बस कमी मेरी इतनी रही दिखावा न किया।
अपने कर्तव्यों का कभी श्रेय मैंने न लिया।।

मैं अपने दिल के अरमानों को जता न सका।
मैं कभी अपने ह्रदय के भाव दिखा न सका।।

क्योंकि मैं अपने कर्म रूपी पथ का पथिक हूं।
अपनी इसी धरा का वासी मैं एक पुरुष हूं।।

नाम - विक्रांत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)