वो चाँद सा मुखड़ा उसका 
होंठ गुलाब की पंखुड़ियों से
लगे बहते हुए झरने हों कोई
जो खिलखिला कर वो हँस दे!
वो सुराही सी गर्दन उसकी 
कजरारे से वो नयन नशीले 
उठा कर पलके झुका ले जो 
मदहोश सभी को वो कर दे!
वो बलखाती नागिन सी कमर 
उसपर लहराते काले बाल 
लगे मोरनी विचर रही हो 
जो मटक मटक कर वो चल दे!
मन-मदिर मे घंटिया बजादे 
वो बेपरवाह उसकी अंगड़ाई 
महकते बदन की खुशबू से 
सब घर-आँगन को वो भर दे!
जो खिलखिलाकर वो हंस दे!!
सतीश निर्दोष
रेवाड़ी (हरियाणा )