""आज बहुत खुशी का दिन है न'" उत्तम ने अपनी खुशी को जाहिर करते हुए माधुरी को देखा जो खुशी से पुलकित हुए जा रही थी
" हां आप सही कह रहे हैं" वो उस कागज़ को थामे हवा में उड़ रही थी जो उसके बी. एड. एंट्रेंस एग्जाम में सफल होने की गवाही कर रहा था साथ ही पहले प्रयास में मेरिट लिस्ट में आने को सूचक भी था ।
" मैं तो जैसे सपना देख रही हूं , मुझे पढ़ने की बहुत इच्छा थी पर इंटर पास करते ही मेरी शादी कर दी गई , आपको भी सोचने में कितना वक्त लगा था कि मैं आगे पढ़ाऊं या नहीं "
" हां तुम सही कह रही हो पर शिक्षा के प्रति तुम्हारा लगन देख कर मैंने तुम्हे आगे पढ़ाने का फैसला ले लिया , ये बात अलग है कि बाबू छोटा था इसलिए हमें ये फैसला लेने में पूरे आठ साल लग गए" उत्तम ने माधुरी की बात का समर्थन किया।
माधुरी याद करने लगती है कि शादी के बाद उसे अपनी शिक्षा जारी रखने में कितनी दिक्कत हुई थी , अपने पति और ससुराल वाले को ही मनाने में कितने साल गुजर गए, उसके बाद घर व बच्चों की जिम्मेदारी के बीच अपनी पढाई कर पाना एक अग्नि परीक्षा के समान था।
कभी कभी उसे लगता था वह सफल ही नहीं ही पाएगी और ये पढ़ाई लिखाई सब छोड़ - छाड़ दे मगर पढ़ाई के प्रति लगन ने उसे ये करने से रोक लेता था।
" तुम्हें याद है माधुरी जब तुम्हारा एम. ए. का लास्ट पेपर था ,हमारा बेटा सीढ़ियों पर से गिर पड़ा था और उसकी जान मुश्किल से बची थी" उत्तम ने माधुरी की तंद्रा भाग करते हुए एक पुराने जख्म को कुरेद दिया।
माधुरी उस पल को कैसे भूल सकती है , वो आज भी सिहरन पैदा कर देता है जबकि इस घटना को बीते पूरे एक साल हो गए थे।
दोपहर से उसका पेपर था और पतिदेव बाबू को पड़ोस के घर छोड़ने वाले थे इतने में उसकी आंखो के सामने ही उसका बच्चा सीढ़ियों से एकदम नीचे गिर पड़ा है वो सुन्न हो गई , होश आया कुछ सेकेंड में तो भागी मगर बच्चा कहीं नहीं दिखा हां फर्श पे खून जरुर फैले हुए थे उस चक्कर आने लगा बदहवास सी सड़क पे भागी खून की लकीर के पीछे पीछे पर पति और बच्चा कोई नहीं दिखा , गर्मी के दिन थे सड़क सुनसान वह पूछे तो किससे!
उसने देखा था कि जैसे बाबू गिरा उत्तम एक ही फर्लांग में नीचे कूद गए फिर पता नहीं कहां आंखो से ओझल हो गए, इतने में पड़ोस की एक बूढ़ी काकी दिखी उसी ने बताया कि उत्तम बच्चे को लेकर हॉस्पिटल में है और बच्चे का सर फट गया है पर वह अब खतरे से बाहर है..., उसी ने उत्तम का मैसेज भी दिया कि वो जाकर एग्जाम दे आए क्योंकि वो अब शाम को वापस आएंगे और ये उत्तम का सख्त निर्देश था।
वो दिन और आज का दिन... वह अपने बेटे को सीने से चिपका लेती है उसके कानों में डॉक्टर की वो बात गूंजने लगती है आप दुबारा अब मां नहीं बन पाएंगी ... उफ्फ तब भी मैं और मेरा बेटा मुश्किल हालत से गुजर रहे थे जब मैं प्रसव पीड़ा को झेलते झेलते बेहोश हो गई थी और डॉक्टर्स ने मां या बच्चे में से एक को ही बचाने का जिम्मा लिया था... ये कुदरत का करिश्मा या किसी के दुआओं का फल ही रहा कि आज हम दोनों सही सलामत हैं , पर उस दिन... कुछ भी हो सकता था...। उसके तन बदन में सिहरन सी दौड़ गई।
"खैर छोड़ो आज हमने इतनी कठिनाई से इस मुकाम को पाया है बस तुम किसी तरह बी. एड कर लो फिर हम फुर्सत में आ जाएंगे । बाबू भी अब समझदार हो चला है आगे पढ़ने में तुम्हे कोई दिक्कत नहीं होगी मैं हूं न हमेशा की तरह" उत्तम ने उसके मनोभावों को ताड़ते हुए उसे दिलासा दिया,
अरे ! हां तुम्हारा इंटर का सर्टिफिकेट चाहिए होगा काउंसलिंग के लिए पापा से कहना वो भेज देंगे"।
माधुरी ने आगे की पढ़ाई के लिए पुनः हिम्मत जुटाई " जी!! पापा से बात कर लूंगी"
माधुरी को चिढ़ थी कि पापा उसकी पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद शादी करते तो ठीक रहता पर यहां भी अन्य बहनों की शादी की दुहाई दी गई और वह हार गई ।
" देखती हूं पापा मेरे इस काम में सहयोग करते हैं कि नहीं।" तब से अब तक उसने पिता से जल्दी कोई सहयोग नहीं लिया।
"हैलो पापा , प्रणाम कैसे है आप लोग... हम सब भी ठीक है... वो पापा मेरा बी. एड. एंट्रेंस में हो गया है... इंटर का सर्टिफिकेट मैं निकाल नहीं पाई थी आप उसे मेरे स्कूल से लेके भेजवा देंगे?" माधुरी ने झिझकते हुए कहा ।
" तुम इतनी डिग्रियां ले ली क्या कभी ने तुमसे पहले सर्टिफिकेट मांगा था?" पापा ने पूछा ।
"जी पापा!!! पर ये शिक्षा विभाग में हैं न इसलिए मेरा एडमिशन हो गया और हमने सोचा कि यहां की डिग्रियों का प्रमाण पत्र लेना होगा तभी उसे जमा कर इकट्ठा ले लेंगे ... यहां तो मिल जाएगा बस आप उसे भिजवा देते तो...।"
"पर ये तो असंभव है?"
" क्यूं पापा... ?"
"तुम्हें याद है तुम इंटर में फेल थी।"
" जी!! पर आपने तो कॉपी पुनर्मूल्यांकन करवाया था और मेरे पास होने की खबर आप ही ने दी थी और आगे पढ़ाई जारी रखने की भी....।माधुरी को याद आता है कि उसकी तैयारी पूरी नहीं थी सो वह एग्जाम देना नहीं चाहती थी पर पापा के कहने पे ना नहीं कह पाई थी और फेल ही गई थी।
" हां पर मुझे फर्जी मार्कशीट बनवाना पड़ा था ताकि तुम्हारी शादी हो जाए मैं साल बर्बाद नहीं करना चाहता था ... अब फर्जी मार्कशीट का सर्टिफिकेट कैसे मिलेगा?
कोई प्राइवेट जॉब ही कर लो सरकारी का सपना छोड़ दो ।"
माधुरी के पैरों तले जमीन खिसक गई तब वह पुनः परीक्षा देना चाहती थी पर पापा ने कॉपी रिचेकिंग उचित समझा.... क्या इसीलिए की मेरी शादी हो जाए... वह हमेशा इस बात से डरती रही और पिता से सच जानने का प्रयास करती रही... इतना बड़ा झूठ " क्यों पापा ??? आपने ये क्या किया !!!! इतने सालों की मेरी मेरे बच्चे की मेरे पति की सारी की सारी तपस्या को नष्ट कर दिया !!!
यदि ऐसा ही करना पड़ा था तो ये सच तब भी बता सकते थे जब मैंने विवाह पश्चात अपनी पढ़ाई आरंभ की थी शायद मैं अपना फैसला बदल देती या और आगे से शुरुआत करती पर इतना सफर ताए करने पे....!!! " वह कहना तो बहुत कुछ चाहती थी पर कुछ भी कह नहीं पाई, गला रूंध गया, फोन हाथ से छूट गया और उसके आंखो के आगे अंधेरा छा गया।
पिता ने आगे कुछ और भी कहा होगा पर वो सुन नहीं पाई ... उसकी #मनोकामना पूरी होते होते रह गई... वह अपने पति से क्या कहेगी... कोई विश्वास करेगा !!! एक पिता ऐसा भी कर सकता है।
वह धीरे से उठी पंखे पे साड़ी लटकाया
तभी बाबू ने कहा मम्मा ये क्या कर रही हो और वह साड़ी नीचे खींच बच्चे को गोद में ले कर फूट फूट के रोने लगी... ।
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मौलिक व स्वरचित
कीर्ति रश्मि "नन्द ✍️
वाराणसी

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