कार्यकुशलता का हमेशा सम्मान होता है। भले ही विशाल अस्पताल में सबसे ज्यादा युवा है फिर भी अस्पताल प्रशासन की नजरों में उसका बहुत सम्मान है। यह बात उस दिन सिद्ध भी हो गयी जब अस्पताल प्रबंधन ने स्त्री विशेषज्ञ के पद के लिये आवेदनों पर विशाल की राय मांगी थी। वैसे तो प्रबंधन ने पहले ही निर्मला को पसंद कर लिया था। फिर भी विशाल से परामर्श लिया। लगता है कि प्रबंधन ने विशाल की राय को इसलिये और महत्व दिया क्योंकि विशाल और निर्मला दोनों की एमबीबीएस की पढाई एक ही कालेज की थी।
विशाल की सहमति के साथ ही निर्मला की नियुक्ति पर मुहर लग गयी। उसी दिन से विशाल निर्मला का इंतजार देख रहा था। कुछ बातें उसकी समझ में अभी तक नहीं आ रहीं। उसे तो लगता था कि निर्मला अब तक विवाह कर चुकी होगी। पर उसके आवेदन पर कुमारी का संबोधन और कही भी पति का उल्लेख न होना विशाल को विचलित कर रहा था। उसके दिमाग में तो निर्मला की कुरूपता के कारण उसका अविवाहित रह जाने जैसी कोई बात आयी ही नहीं। सुंदरता और कुरूपता तो हमेशा मन से नापी जाती है। इतने समय के साथ में विशाल को निर्मला कभी कुरूप लगी ही नहीं।
आज सुबह से ही विशाल निर्मला का इंतजार कर रहा था। अनेकों बार बाहर भी देखने आया। पर निर्मला का कोई पता नहीं। यह भी संभव है कि निर्मला ने आने का विचार ही त्याग दिया हो। ऐसा अनेकों बार होता आया है।
शाम के समय भी वह अस्पताल की खिड़की से बाहर देख रहा था कि उसे ओटो से उतरती हुई निर्मला दिखाई दी। तुरंत वह निर्मला को रिसीव करने मुख्य द्वार तक चल दिया। दूर से निर्मला ने भी विशाल को आते देखा। यही वह समय था कि दोनों ही कहीं खो गये। ओटो का चला जाना उसने भी नहीं देखा।
आज दो बहुत पुराने मित्र बहुत सालों बाद मिले। दोनों के पास बताने को बहुत कुछ था। पर पहले विशाल ने निर्मला को अस्पताल प्रबंधन से मिलाया। अस्पताल के दूसरे डाक्टरों से भी मिलाया। फिर वह निर्मला को उसके रुकने के कक्ष में छोड़ आया।
कक्ष बहुत बड़ा भी नहीं था और ज्यादा छोटा भी नहीं। भोग विलास से रहित किसी साधक का साधना केंद्र जैसा होने पर भी रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं से युक्त था।
सबसे पहले तो निर्मला ने अपने पापा और मम्मी से बात की। दिन भर की सारी बातें बतायी। और अंत में किस तरह वह ओटो बाले भैय्या गायब हो गये, बताते बताते तो भावुक भी हो गयी।
फिर स्नान कर तैयार हो गयी। अपने सामान को लगाने लगी। सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण की एक छोटी सी प्रतिमा निकालकर आले में स्थापित कर उसमें अपना पूजाघर तैयार किया। दूसरा सामान भी व्यवस्थित कर लिया। तब तक रात भी हो गयी। विशाल अभी किसी इमर्जेंसी केस के सिलसिले में चला गया था। पर अस्पताल का एक कर्मचारी निर्मला के लिये भोजन ले आया। कार्य पर लगे होने पर भी विशाल को अपनी पुरानी मित्र की चिंता थी।
अगले दिन से निर्मला ने भी अपनी ड्यूटी जोइन कर ली। काम में तो वह वैसे भी बहुत होशियार थी। जल्द ही उसकी कार्यकुशलता की अस्पताल में धाक जम गयी।
इतना नजदीक होने पर भी विशाल और निर्मला को बात करने का बहुत कम समय मिल पाता। पर जितना भी समय मिलता दोनों साथ जरूर बिताते। इतने समय में दोनों के जीवन में जो जो घटित हुआ, दोनों को पता चल गया। निर्मला के मन में एक गर्व की अनुभूति हुई। आखिर उसके मन में जिसके प्रति प्रेम आया, वह तो इतना बड़ा साधक निकला।
विशाल को भी अनेकों पुरानी छोटी छोटी बातें स्मरण हो आयीं। अनेकों बार बहुत छोटी छोटी बातें दूसरों के प्रेम का द्योतक होती हैं। उस समय विशाल के सपनों की नायिका लक्ष्मी थी। इसलिये उस समय उसे वे छोटी छोटी बातें समझ नहीं आयी। आज विशाल को उन छोटी छोटी बातों में निर्मला का प्रेम दिखाई देने लगा।
क्या मनुष्य के लिये खुद के स्वप्न ही महत्वपूर्ण हैं। लगता है कि नहीं। फिर विशाल तो पहले भी लक्ष्मी के स्वप्नों को खूद के स्वप्नों पर वरीयता दे चुका था। तो फिर निर्मला के स्वप्न भी महत्वपूर्ण हैं। अनेकों बार दूसरों के स्वप्न भी जीवन को दिशा देते हैं।
प्रेम में कभी भी कुछ आसान नहीं होता। विशाल को लगता कि यदि वह इस समय निर्मला को कुछ कहता है तो इसका अर्थ कुछ अलग ही है।लक्ष्मी के न मिलने की स्थिति में किया गया प्रेम निवेदन वास्तव में स्वार्थ ही माना जायेगा।
दूसरी तरफ निर्मला को भी यही लगता कि यदि वह अपने प्रेम की बात विशाल से बोलेगी तो उसका अर्थ यही होगा कि बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा। अनेकों लड़कों ने शादी करने से मना कर दिया और जब मौका मिला तो फायदा उठा लिया।
निश्चित ही ऐसी स्थिति में दोनों के साथ होने पर भी मिलन की कोई भूमिका नहीं बनती। पर वह भूमिका उसी दिन बन चुकी थी जब निर्मला वृन्दावन आयी थी। माता कात्यायनी के मंदिर में उसके मन में उठी प्रेरणा कोई संयोग तो नहीं। उस समय तक तो उसे पता भी था कि विशाल एक विशाल त्याग कर जीवन की राह पर अकेला चल रहा है। उस समय निर्मला के मन में यह बात कैसे आयी कि विशाल अकेला है। उसे निर्मला सहारे की जरूरत है।
ओटो बाले भाई का रहस्य कुछ भी हो पर निर्मला तो उन्हें अपने कृष्ण भैय्या ही मान चुकी है। तो जो भी हो रहा है कुछ भी निष्प्रयोजन तो नहीं है।
आखिर निर्मला ने आगे बढने का निश्चय कर लिया। अनेकों बार बड़े कार्य के लिये पहला कदम महिलाओं को ही बढाना होता है। वह इस राह में विशाल की संगिनी बनेगी। वैसे तो निर्मला को भोगों में कोई खास रुचि नहीं है। पर यदि विशाल चाहेगा तो उसके लिये किसी भी खुशी को अर्पण कर देगी।
लगता है कि समय ही कुछ समय रुक गया। विशाल को निर्णय लेने में कुछ समय लगा। क्या खुद के कारण किसी को दुखी करना सही है। निश्चित ही नहीं। खुद के लिये तो वह कांटों का मार्ग चुन चुका है। निर्मला को कांटों पर क्यों चलाये।
तभी मन का दूसरा कौना निर्मला की महानता का बखान करने लगा। विशाल की छोटी सोच के लिये उसे धिक्कारने लगा। एक स्त्री के सामर्थ्य को कम कर आंकना तो उसका अपमान ही है।लक्ष्मी को ही देख लो। कितने धनी परिवार में पली बढी। आखिर संकल्प के साथ कितनी खुश है। किसी लड़की के लिये तो सबसे बड़ी खुशी उसके सपनों का हकीकत में बदलना ही है।
उसी दिन विशाल ने अपने माता पिता को तथा निर्मला ने अपने माता-पिता को अपनी राय दे दी। अपनी पसंद पर माता पिता की पसंद की मुहर लगना ही वास्तविक खुशी है।
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डाक्टर नामदेव का अस्पताल देख कर शांताराम जी एक बार फिर से चिंता में पड़ गये। मरीजों की बड़ी भीड़ थी। पहले भी एक धनी डाक्टर ने उनकी बेटी का हाथ मांगा था। पर बाद में पता चला कि सब साजिश है। वैसे बेटी की समझदारी पर संदेह नहीं किया जा सकता है। फिर भी बेटी के प्रेम में ऐसा हो जाता है। बेटी कितनी भी समझदार हो, माता पिता को चाहिये कि उसके निर्णय को अपनी तरह से जांच लें। यदि कुछ गलत लगे तो बेटी को समझायें। अभी तक तो उन्हें बेटी का निर्णय सही नहीं लग रहा है। इतना धनी आदमी के परिवार में बेटी को कहाॅ सम्मान मिलेगा।
पर जल्द ही शांताराम जी का निर्णय बदल गया। विशाल को भी नहीं मालूम कि उसके पिता भी उसी की राह पर चल चुके हैं। आज डाक्टर नामदेव के अस्पताल में निर्धनों का निःशुल्क इलाज हो रहा है।
" आओ मित्र। संसार में वह पिता बड़ा भाग्यशाली है जो बेटे से कुछ सीखे। मेने अपना पूरा जीवन परमार्थ में लगाने का निश्चय किया है। चाहता हूं कि एक न एक दिन बेटा हमारी नजरो के सामने आ जाये। निश्चित रहो। आपकी बेटी को अपनी बेटी ही मानूंगा। वैसे भी आपकी बेटी कोई साधारण तो नहीं है। साधारण तो आप भी नहीं हैं। एक असाधारण बेटी का पिता भला साधारण कैसे हो सकता है। "
बहुत देर बाद जब डाक्टर साहब फुर्सत में आये और शांताराम जी ने उन्हें अपने आगमन का प्रयोजन बताया तो डाक्टर साहब के मुख से ऊपर बाले उद्गार निकले। फिर डाक्टर साहब शांताराम जी को अपने घर लेकर पहुंचे। भले ही मकान बहुत भव्य है पर आज की स्थिति में किसी तपोभूमि जैसी स्थिति में है। घर के एक हिस्से में अनाथाश्रम चल रहा है। जिसकी व्यवस्था खुद सुनीता जी देख रही हैं।
शांताराम जी को अपूर्व शांति का अनुभव हुआ। पर रिश्ता तय करने से पूर्व डाक्टर साहब ने एक अजीब शर्त रख दी। रिटायर्मेंट के बाद शांताराम जी यदि सपत्नीक अपनी बेटी के साथ रहने को तैयार हों तो ही रिश्ता तय किया जा सकता है। आखिर हमारी बहू का मन भी तो अपने माता-पिता की देखभाल का होगा। फिर उसके सिवाय आपका है ही कौन। निश्चित रहिये। आप बेटी के पास रहकर भी कोई पाप नहीं करेंगे। परोपकार में जीवन बिताने के अनेकों तरीके हैं।
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विशाल ओर निर्मला का विवाह बहुत सादगी से संपन्न हुआ। उनके विवाह में संकल्प और लक्ष्मी भी सम्मिलित हुए। विशाल की जीवन में आज उसके समकक्ष साथी देखकर लक्ष्मी को बहुत खुशी हुई।
अनेकों सालों तक विशाल और निर्मला ने वृंदावन के काले बाबू अस्पताल में अपनी सेवाएं दी। आखिर में पिता के कहने से दोनों घर वापस आ गये। उसी इरादे से अपने शहर में सेवा करने लगे।
एक बार यदि कोई अच्छाई की राह पर चल दे तो फिर वह अनेकों को राह दिखा देता है। शांताराम जी भी रिटायर्मेंट के बाद अपनी पत्नी सुजाता के साथ यहीं रहकर मानवता धर्म का पालन करने लगे।
दूसरी तरफ लक्ष्मी के पिता बकील साहब सुदर्शन जी ने गलत मुकदमे लड़ने बिलकुल बंद कर दिये हैं। परेशान गरीबों के मुकदमे वह निःशुल्क लड़ते हैं तथा उन्हें न्याय भी दिलाते हैं। लक्ष्मी के दादा जी शुभचरण जी भी अपना जीवन परोपकार में बिता रहे हैं। लक्ष्मी की असली माॅ रुक्मिणी अब शुभचरण जी की पुत्री की भांति उनके साथ रहती है तथा उनके परोपकार में उनकी सहयोगी बनी हुई है।
कभी अपने प्रेमी को अपना जीवन साथी बनाने के स्वप्नों के साथ आरंभ हुई सपने की कहानी का अब मानवता को ही विश्व धर्म बनाने के बहुत बड़े सपने के साथ समापन हो रहा है। सपने तो वही हैं तो पूरे संसार का कल्याण चाहें। खुद की उन्नति के सपने तो पशु और पक्षी भी देखते हैं। मनुष्य तो वही है जिसके सपने भी कुछ बड़े हों, खुद से आगे हों।
समाप्त
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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