आंखे मलते हुए जैसे ही लक्ष्मी उठी, सुलक्षणा ने उसे गले लगाकर  बेतहाशा प्यार करने लगी।लक्ष्मी इतनी बड़ी हो चुकी है। फिर भी आज तक सुलक्षणा उसे छोटी बच्ची ही समझती हैं। 

  सपनों के जंजाल में लक्ष्मी को ध्यान ही नहीं रहा कि आज उसके जीवन का कोई खास दिन है। आज ही के दिन लक्ष्मी मंदिर की सीढियों पर मिली थी। हर साल आज के ही दिन लक्ष्मी का जन्म दिन मनाया जाता है। हर साल जन्म दिन से पहले लक्ष्मी फरमाइशों से घर भर देती थी। पर इस साल वह बहुत शांत रही। 

  घर में ज्यादा ही खुशी का माहौल था। घर का काम करने बाली रुक्मिणी बूआ भी आज जल्दी घर आ चुकी थीं। पूरे घर को साफ कर सजाया जा रहा था। 

  रुक्मिणी की हैसियत इस घर में कामबाली से बहुत ज्यादा थी। यह सुदर्शन के संस्कार थे कि घर में काम करने बाली एक निर्धन कन्या को वह बहन की तरह आदर देता था। रुक्मिणी इस घर में उस समय से काम कर रही हैं, जब लक्ष्मी धरती पर भी नहीं आयी थी। रुक्मिणी के पति का काफी समय पूर्व देहांत हो चुका है। दुनिया में उसका कोई नहीं है। पर रुक्मिणी खुद यह नहीं मानतीं है कि उसका कोई नहीं है। इस परिवार ने उसे वह प्रेम दिया है कि कह सकती है कि उसका भी कोई है। कोई परिवार ऐसा है जिसे वह खुद का परिवार कह सकती है। 

  " हैप्पी बर्थ डे बेटा।" 

  हर साल लक्ष्मी को सबसे पहले रुक्मिणी ही जन्म दिन की बधाई देती थी। उसके बाद सुदर्शन, सुलक्षणा और रवि बधाई देते थे। रुक्मिणी लक्ष्मी को बचपन से ही बहुत प्रेम करती थी। जब वह छोटी थी तो रुक्मिणी ही ज्यादातर उसे सम्हालती थी। शायद इसी लिये घर में उसे ऐसा अधिकार मिला था। 

   लक्ष्मी अभी भी सपनों से पूरी तरह बाहर नहीं आयी थी। पर जब रुक्मिणी बूआ ने उसे जन्म दिन की बधाई दी तो सकुचा गयी। भला घर बालों की जगह कौन ले सकता है। एक अनजान युवक जो उसके स्वप्नों का हिस्सा बना है, वह भी नहीं। पर आज वह किसी अनजान के कारण खुद को भी भूल गयी है। उसे खुद का जन्म दिन भी याद नहीं है। संकोच के कारण वह रुक्मिणी के गले लग गयी। 

  " अब यह भी तो पकड़ो।" रुक्मिणी ने लक्ष्मी को एक थैली पकड़ा दी। लक्ष्मी जानती थी कि रुक्मिणी बूआ उसके लिये हर बार की तरह उपहार लेकर आयीं हैं। उस उपहार की कीमत दाम के लिहाज से कम हो। पर रुक्मिणी के प्रेम के लिहाज से बहुमूल्य ही होगा। 

  हर साल की तरह लक्ष्मी ने वह उपहार खोला। बहुत सुंदर सूट था। गुलाबी रंग का सूट गोरे रंग की लक्ष्मी पर बहुत सुंदर लगेगा। 

  उसके बाद सुदर्शन, सुलक्षणा व रवि ने लक्ष्मी को जन्म दिन की बधाई दी। लक्ष्मी की गोद बहुमूल्य उपहारों से भर गयी। पर सभी उपहारों के ऊपर रखा रुक्मिणी का सूट यही सिद्ध कर रहा था कि रुक्मिणी के उपहार की इज्जत दूसरे बहुमूल्य उपहारों के सामने  कम नहीं है। 

     थोड़ी ही देर में लक्ष्मी के दादा जी भी गांव से आ गये। दिन में सत्यनारायण भगवान की कथा रखी तथा शाम के समय कुछ मित्रों और रिश्तेदारों को भोजन पर आमंत्रित किया था। खाना खुद रुक्मिणी ने तैयार किया। रवि ने गुब्बारों से पूरा घर सजा दिया। 

   भगवान सूर्य की विदा से पूर्व ही घर में रिश्तेदारों का जमावड़ा होने लगा। हर साल की तरह आज फिर से दुनिया देखेगी कि वकील साहब अपनी पालिता पुत्री को खुद की बेटी की भांति स्नेह करते हैं। लक्ष्मी के जन्म दिन का भव्य आयोजन उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो अपने बेटों का जन्म दिन तो मनाते हैं। पर बेटियों को उनके हिस्से की जरा सी खुशी भी देना जिन्हें गवारा नहीं। 

क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'