कितने  मासूम  होते  बच्चे,
होती नहीं छल कपट उनमें,
होते हैं  सभी मन के  सच्चे।
भगवान  का  रूप वे  होते ।।

मैं  भी  था  इक  मासूम बच्चा ,
निर्मल और निष्कपट मन मेरा।
प्रेम  और  शांति  से  भरा  था,
मेरा  जगत  कितना सुंदर  था।।

होकर  बड़ा  जगत  मैं   देखा,
कितने  जंजालों  से  है  भरा।
नहीं शांति , प्रेम  का  ठिकाना ,
तांडव  यहाँ   ईर्ष्या   द्वेष  का  ।।

होकर  बड़ा  मैं  यही चाहा,
रहूं  भोला  इक बच्चे जैसा।
जग इसको कमजोरी माना,
और मुझे इक अनाड़ी कहा।।

मासूमियत  बचपन  में जहाँ,
दुनियां  को प्यारा  है  लगता ।
बड़े होकर  निर्मल मन रखना,
जगत को मूर्खता  ही  लगता ।।

जग चाहे प्रभु, कुछ भी कह ले,
बच्चे    जैसा   ही  मुझे  रखना ।
चाह   नहीं   चतुरता   की  मुझे,
 मासूम  बच्चा-सा  ही   रखना।।


-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती    "दिवाकर"