रेतीले बंजर तपती भूमि पर
पानी की बूँद को तरसती
पनिहारिन के चेहरे की मुस्कान
लगे जैसे सावन की बहार
गजब का जज्बा देखा उनमें
परिस्थितियों को अनुकूल बनाया
उम्मीद की किरण न मिटने दी
तब जाकर कहीं नीर पाया
एक कलश नीर की खातिर
जाने कितना पसीना बहाया
न कोई छुपने की कहीं जगह ही मिली
न मिली कहीं पेड़ की शीतल छाया....
नेहा शर्मा

0 टिप्पणियाँ