ये मत समझना आज लोगों,
कि कोई कथा लिख रहा हूँ,
शिखर की ओर बढ़ती नारी के,
हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ।
अक्सर उनकी कला को बस,
एक ही पैमाने पर परखा सबने,
उनको सम्मान देती नज़रो ने भी,
क्या क्या ना नज़र में रखा सबने।
उन नजरों में छुपी भावनाओं की
वो ही मानसिकता लिख रहा हूँ।
शिखर की ओर बढ़ती नारी के,
हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ।
अपने भीतर कला, कलाकार बनकर,
वो सामने क्या गई जमाने को दिखाने,
कूछ लोग भी आगे बढ़े, कूछ सोचकर,
अवसरों के सब्जबाग लगे जो दिखाने।
उसके बदले उन पर जो हक चाहते हैं
मन की वही नीचता लिख रहा हूँ ।
शिखर की ओर बढ़ती नारी के,
हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ।
आई है लोगो में , तो कूछ लोगों की
अब क्या वो निजी सम्पत्ति लगती है।
जिस नज़र में सम्मान खोजती रही
वो जिस्म के उतार चढ़ाव देखती है।
उस नारी की मुस्कान में छुपे हुए
दर्द की वो गम्भीरता लिख रहा हूँ।
शिखर की ओर बढ़ती नारी के,
हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ।
वो तो शुक्र है कि इस भीड़ में भी
कूछ तो निर्मल हृदय भी विचरते हैं।
इन प्रतिभाओं को प्रोत्साहित और,
हृदय से सम्मानित भी सदा करते हैं ।
दिल से नमन है उन्हे साथियों कि,
अब बदलती सी फिज़ां लिख रहा हूँ।
शिखर की ओर बढ़ती नारी के,
हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ।
नारी अब तुझे भी धैर्य से बढ़ना होगा
सबको दिखाने हैं तुम्हें अपने इरादे
जिससे बहुत सी प्रतिभायें आज यहां
निकल गई पुरुषों से भी कहीं आगे।
गर्व से इनका मान भी हम अब तो,
दिल से करेंगे सर्वदा लिख रहा हूँ।
शिखर की ओर बढ़ती नारी के,
हृदय की व्यथा लिख रहा हूँ।
🙏🙏रंजन लाल🙏🙏

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