मेरी बन्द आँखों ने देखे थे कभी जो टिमटिमाते सपने,
तेरे साथ से वो सब हकीकत में हो गए अपने।
कोई ख़्वाब कोई ख़्वाहिश न रही,
अब जिंदगी से कोई फरमाइश न रही,
जब से तुम दिल से उतरके रूह में लगे बसने।
मिले हम जमाने से मिलने में कोई बुराई नही,
पर दिखी किसी में तेरी परछाई नहीं,
नही मिलता तुमसा ,सब बैठे हैं मीठी बातों से ठगने।
जब तुम दूर होते हो तन्हाई का दौर बढ़ता है,
दिल कितना उदास होता कितना सिसकता है,
कहीं भटक न जाऊँ राह लगे हैं घर से कम निकलने।
आसमान के तारों सी झिलमिलाहट से सपने,
तेरे सिवा किसी के साथ नही बुनने।
दुनिया की दोरंगी तबियत से मासूम अंजुम लगी डरने।
जहाँ में मिलने को लोग बहुत मिलते हैं,
पर दिल के दरीचे में बस तेरे ही गुल खिलते हैं,
जिनमे तेरी मौजूदगी न हो नही देंगे हम आँखों मे वो ख़्वाब पलने।
अन्जू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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