हास्पिटल मे अफरा तफरी मची हुई थी।डाक्टर और नर्सेज भी बहुत हैरान थे क्योंकि केस ही कुछ ऐसा था
जोधपुर की एक राजघराने कि बहु ने आत्महत्या करने की कोशिश की है ।
रात के ग्यारह बजे एमरजेंसी केस आता है। जला हुआ बदन छटपटाती हुई असीम वेदना से तड़पती हुई साँसे मध्यम मध्यम चल रही थी। उसे आई . सी . यू
रूम मे वेंटिलेटर पर रखा जाता है। चारो तरफ से मशीनों से घिरी मुहँ पर मास्क, जिंदगी और मौत के बीच साँसो की लड़ाई लड़ रही थी।
चूंकि ये आत्महत्या का केस था पुलिस भी आ चुके थे। मगर पीड़िता की हालत इतनी क्रिटिकल थी कि वह बयान देने के हालत मे नहीं थी। पुलिस अपनी तफ्तीश चालू करते है। हास्पिटल मे मौजूद उसके पति आदित्य सिंह राठौर से सवाल जवाब करने लगते है।
लेकिन आदित्य सिंह राठौर किसी भी सवाल का जवाब देने से साफ इंकार कर देते है। ये कहते हुए कि अभी उनका दिमाग बहुत डिस्टर्ब है। अपनी पत्नी की मौजूदा हालात देखकर। वह अभी इस कंडीशन मे नहीं है वह उनके कोई भी सवालों का जवाब ठीक से दे सके।
पुलिस कि नजर कोने मे खड़ी एक महिला पर पड़ती है ।जो घाघरा चोली पहने हुई थी माथे पर चुनड़ी ओढे हुए , चुनरी को दांतो तले दबाकर सुबक सुबक कर रो रही थी।
इंस्पेक्टर सुशील शिंदे उस महिला के पास जाते है। उनसे पूछते है आपका परिचय
"सा मै बहुरानी की सेविका हूँ।" महिला ने कहा
"कब से काम कर रही हो हवेली मे" इंस्पेक्टर शिंदे ने पूछा
"हवेली मे तीस बरस से काम कर रही हूँ। जब म्हारी बहुरानी रो ब्याह हुओ है तब से म ही बिना के सागे रहया करू हूँ ।"
"जब ये हादसे हुआ था आप कहाँ थी??"इंस्पेक्टर शिंदे ने पूछा
"म आपका कमरा मे सो रही थी। मने के पतो(मुझे क्या पता) बहुरानी इतनो बड़ो कदम उठा लेवेगी। नहीं तो म इना न छोड़कर कठे ही कोनी जाती।" सेविका ने कहा। कहकर फिर चुप हो जाती है।
"बहुरानी के मायके से कोई कोनी आयो के" इंस्पेक्टर शिंदे ने पूछा
"खबर तो मालिक सा ने दे दी होसी बे भी आता ही होसी।" सेविका ने कहा
"अच्छा जब से बहुरानी साहिबा को ब्याह होयो तू तब से चाकरी करे है। मने शुरू से बता"
सेविका इंस्पेक्टर शिंदे को वंशिका आदित्य सिंह राठौर के बारे मे बताना शुरु करती है।
जोधपुर मे आदित्य सिंह राठौर के चाचा के बेटे की शादी के फंक्शन चल रहे होते । सभी मस्ती मे सारे नेग चार का आनंद ले रहे होते है।
हल्दी के रस्म मे दाहिने तरफ दूल्हे के परिवार वाले रिश्तेदार और दोस्त और बायें तरफ दुल्हन के परिवार वाले रिश्तेदार और उनकी सहेलीयाँ।
दूल्हा दुल्हन को बाँस की टोकरी के ऊपर बैठाया जाता है।
सभी हँसी मजाक कर रहे थे। कही टोकरी ना टूट जाए
इसलिए दोनो ही पक्षो के लोग उन्हें चिढा रहे थे।
बड़े बुजुर्ग दुल्हा दुल्हन को हल्दी चढाने मे व्यस्त थे।
दुल्हन पक्ष के तरफ से एक लड़की आदित्य को बोलती है। सुनिए सा मेरी दीदी तो हल्की फुलकी सी है। थे तो आपके दुल्हे राजा ने देखो कही टोकरी टूटकर बे जमीन मे धराशायी न हो जाए कहकर सभी छोरियां मुहँ दबाकर हँसने लगी।
लेकिन आदित्य को कोई होश.नहीं रहता है वह तो उस छोरी के रूप सौंदर्य को देखकर देखता ही रह जाता है
देखने मे कद काठी से छोटी ,तीखे तीखे नैन नक्श वाली ,बोली मे तेज तर्रार ,घुँघराले लट वाले खुले लम्बे बाल ,होंठो पर एक काला तील देखने मे गोरी चिट्टी।
हल्दी के फंक्शन के लिए उसने हल्दी पीला रँग का लहँगा ,चुनड़ी और हाथो मे हरी भरी काँच की चूडियांँ
माथे पर माँगटीका , कानो मे बड़े बड़े कुँडल। कोई भी देखे उस छोरी को देखते ही रह जाए गजब का आकर्षण था उसमे।
आदित्य के दोस्त उसे बार बार पुकारते है फिर सर पर आकर मारते है। फिर भी वह नहीं सुनता है तब आकर कँधे पकड़कर हिलाते है।
और कहते है यहाँ खड़े होकर के ताक रहे हो उस सामने खड़ी सेविका को। मै तो ..मै तो..कहाँ गई वो लड़की । अरे देवदास कौन से ख्याल मे खोया हुआ है। अपने सपने कि दुनिया से बाहर निकलो।
सब ने हिमांशु को हल्दी लगा दिया है, चल लेकर आ बाल्टी कहाँ रखा है तूने ( दूध मे घोला हुआ दही और रंँग) उस पर डालते है । आज तो हिमांशु को मौज कर लेने दो ब्याह के बाद तो रोना ही है।
ये कहकर सभी एकदूसरे को हाए फाए करते है।
आदित्य मन मे सोचता है वो लड़की कहांँ गई। लेकिन अपने दोस्तों के बुलाने.से वह वहाँ चला जाता है।
वह रँग घोली हुई दूध भरी बाल्टी को लाकर हिमांशु के सर पर डाल देता है। वह भी अपने दोस्तों के साथ मिलकर हुड़दंग बाजी करता है।
शाम को पूरा रिसोर्ट रोशनी से जगमागा रहा होता है। जगह जगह खाने पीने के स्टाल ,सेल्फी पाईंट, फूलो की सजावट, तोरण आतिशबाजीयाँ ढोल नगाड़े बैंड बाजा से मद्वम मद्वम धून बहारो फूल बरसाओ बज रहा होता है।
सभी के चेहरे खिलखिला रहे होते है। लेकिन आदित्य की नजर उस छोरी को ढूढ रही थी। जिसने उसका दिल चुरा लिया था। लेकिन वह उसे वरमाला के समय मे नजर नहीं आई ,ना ही फोटो सेसन के वक्त।
उसे वह शादी के फेरो मे सीधे नजर आई। वो भी अपने रिश्तेदारो के साथ आईस्क्रीम खाती हुई।
आदित्य अपने चाचाजी से जाकर पूछता है और उन्हे उस लड़की कि तरफ इशारे करते हुए पूछता है। कौन है ये?? आदित्य अपने चाचाजी के साथ दोस्त कि तरह ही मानता है, इसलिए वो कोई भी बात बेधड़ल्ले से कह देता है।
आदित्य के चाचाजी उसकी चुस्की लेने के लिए पूछते है , के बात है छोरा इरादों थारो नेक है न??
हाँ ...हाँ चाचाजी मै इस छोरी से ब्याह करनो चाहूंँ हूँ।
उसके चाचाजी उसे पता करके आदित्य को बताते है ये दुल्हन की सहेली है नाम है छोरी को वंशिका।
अठारह साल की हुई है आबार (अभी) छोरी के माँ बाप कोनी ,भाई भाभी ही पालन पोषण करो है। दो बहन एक भाई है, या सबसे छोटी है।
"इतना पता कर दिए है, तो एक काम और एक कर दिजिए। थारे भाई सा से कहकर ब्याह करा दो मेरो" आदित्य ने कहा
चाचाजी आदित्य से बहुत प्यार करते थे और कभी भी उसकी बात को नहीं टालते थे। वह जाकर सारी बात अपने भाई को बताते है।
आदित्य सा के पिता सारी बात जानकर पहले तो मना कर देते है। लेकिन अपने बेटे की इच्छा और जिद्द के आगे हारकर मान जाते है।
वंशिका के भाई से सारी बात करते है। वंशिका के भाई भाभी बहुत खुश हो जाते है।
घर बैठे ही बहन के लिए रईसखानदान से प्रस्ताव आया है। सारी जिंदगी खुश रहेगी। वंशिका के भाई को आदित्य भी पसंद आता है। मिलती जुलती हाईट वंशिका से , पतला दुबला स्मार्ट सा लगा। उसके भाई को यही खटक रहा था आदित्य और वंशिका मे दस साल का अंतर है । मगर वंशिका की भाभी समझाती है कि हमारी वंशिका के भाग्य मे राजयोग है। दहेज की भी कोई माँग नहीं है। अंततः वंशिका का भाई भी मान जाता है।
उन दोनो की धूमधाम से शानौशौकत से चट मँगनी पट शादी हो जाती है। आदित्य की खुशी का ठिकाना ही नहीं था।
हवेली मे काफी सालो के बाद.खुशियां दस्तक दे रही थी। वंशिका की ना तो सास थी , ना ही ननद।
आदित्य सा अपने बाबा सा के साथ इतनी बड़ी हवेली मे अकेले रहते थे। चाची सा घर की देहरी पूजवाकर नेग चार करवा देती है।
वंशिका और आदित्य बाबा सा के पैर छूते है। बाबा सा उन दोनो को आशीर्वाद देते है।
आदित्य के बाबा सा रिटायर्ड बेरिस्टर है। इनके पास पुश्तैनी हवेली पुश्तैनी पैसा है । वह एक प्रतिष्ठित समाज सेवी , गरीबो की मदद करना ,गरीब की बेटियों की शादी करवाना , हर वर्ष संस्थाओं मे योगदान देना ये सब इनके मनपसंँद कार्य है।
क्रमशः

0 टिप्पणियाँ