मई के महीने का अंत चल रहा है। भगवान सूर्य धरती पर प्रचंड गर्मी बखेर रहे हैं। वैसे आजकल ज्यादातर लोग सर्दियों में विवाह को वरीयता देते हैं। पर विशाल और लक्ष्मी का विवाह जून के महीने में होगा। उस समय प्रचंड गर्मी पड़ेगी। ऐसे निर्णय का एक विशेष कारण है। विशाल की एमबीबीएस की परीक्षाएं समाप्त होने को हैं। लक्ष्मी की एमए की परीक्षाएं हो चुकी हैं। इसके बाद विशाल एम एस में दाखिला लेगा तो लगभग तीन साल उसे और पढाई करनी होगी। लक्ष्मी भी आगे की पढाई करेगी। उचित है कि जो निर्णय लिया गया है, उसे इन्हीं गर्मी के सालहग में पूरा कर लिया जाये।
एक छोटे से घर में एक महिला और एक लड़की खाना बनाने की तैयारी कर रहे हैं। घर में सुख सुविधा के नाम पर लगता है कि कुछ भी नहीं है। बाहर के कमरे में एक पुराना सा टीवी जरूर रखा है। किसी भी कमरे में एसी तो बहुत दूर, कोई कूलर भी नहीं है। पर लगता है कि इस घर के वाशिंदों को कम सुविधाओं में जीवन जीना आता है।
महिला कोई पचास साल की और लड़की कोई अठारह साल की आयु की है। तभी दरबाजा खटकता है।
" बेटी। जरा देख कर तो आ। लगता है कि शायद तेरे पापा या भैय्या आ गये हैं।"
" अभी मम्मी ।देखती हूं।"
निशि ने दरबाजा खोला तो बाहर संकल्प खड़ा था। आज संकल्प लक्ष्मी को शादी की शोपिंग कराकर आया था। जैसे जैसे विशाल की शादी के दिन निकट आ रहे हैं, वैसे वैसे संकल्प का मन और दुखी होता जा रहा है। ऊपर से विशाल की शादी की सारी व्यवस्था भी उसे ही करनी है।
आज सुनीता जी अपनी होने बाली बहू की पसंद के कपड़े खरीदने गयीं तो साथ में संकल्प को ले लिया। पूरे दिन संकल्प आज लक्ष्मी के साथ रहा। उस समय उसने अपने चेहरे पर शिकन भी नहीं लायी थी। पर इस समय उसके चेहरे की उदासी कोई भी पढ सकता है।
निशि ने भाई को पानी पीने को दिया और फिर संकल्प नहाने चला गया। ऐसी भीषण गर्मी में केवल स्नान ही गरीब का आसरा होता है।
संकल्प ने आज तक अपने मन की बात किसी को नहीं बतायी है। पर लगता है उसकी मम्मी साध्वी को कुछ अंदेशा हो रहा है। संकल्प जब भी लक्ष्मी के घर से वापस आता है, तभी कुछ उदास सा दिखता है। बेटे की उदासी भले ही कोई समझे या न समझे पर उसकी माॅ जरूर समझ जाती है।
थोड़ी देर में संकल्प के पिता विजय भी आ गये। घर में खाना भी तैयार हो गया। निशि ने आंगन में एक बड़ा सा चद्दर तह कर बिछा दी, जिसपर दोनों पिता और पुत्र बैठ गये। साध्वी रोटियां सेकने लगीं और निशि उन्हें परोसने लगी। डाइनिंग टेबल पर साथ बैठकर खाने का कोई कल्चर इस घर में न था। फिर भी गर्म गर्म व प्रेम से परोसे भोजन का अलग ही स्वाद होता है। जो शायद धनी लोगों ने अनुभव ही न किया हो।स्त्रियों का प्रेम से भोजन कराना खुद भोजन का स्वाद बढा देता है।
रात के समय जब संकल्प अपनी चारपाई पर करवट बदल रहा था तो कोई था जो उसे इस तरह वैचेन देख रहा था। साध्वी भले ही ज्यादा पढी लिखी न हो, पर हर माॅ इतनी पढी होती है कि अपने बेटे के मन को पढ सके। साध्वी जी ने अपने बेटे संकल्प के मन को कभी का पढ लिया था। पहले सोचा कि शायद यह आकर्षण है। पर अब समझ चुकी थीं कि यह आकर्षण से कुछ ऊपर है। आज एक माॅ की आंखें अपने बेटे के दुख में गीली हो गयीं। अपने बेटे के लिये कुछ भी कर सकने बाली माॅ आज कुछ न कर पाने के गम में दुखी थी। वैसे भी शायद यह एकतरफ़ा प्रेम है। एक धनी परिवार की लड़की इस घर में एक दिन भी नहीं रुक पायेगी। हर समस्या का इलाज समय है। समय के साथ बड़े से बड़े घाव भर जाते हैं। फिर प्रेम तो त्याग का रूप होता है। उसका पुत्र त्याग कर रहा है। अपने मित्र के लिये भी और उस लड़की के लिये भी जिसे वह प्रेम करता है। आज साध्वी को अपना पुत्र उस ऊंचाई पर खड़ा दिखा, जहाँ तक पहुंच पाना भी किसी सामान्य के वश की बात नहीं है।
कुछ ही दिन गुजरे। दिन का समय था। संकल्प और उसके पिता दोनों विशाल के घर गये हुए थे। निशि भी अपनी किसी सहेली के घर थी। घर में एक अनजान महिला आयी।
" नमस्ते बहन जी। क्या आप ही संकल्प की माॅ हैं।"
" हाॅ ।आप भीतर आयें।" साध्वी जी उस महिला को घर के भीतर तो ले आयीं पर फिर संकोच में पड़ गयी। आखिर इन्हें बैठाएं कहाॅ। शायद आगंतुक महिला साध्वी की मनोदशा समझ चुकी थी। खुद व खुद एक चारपाई पर बैठ गयी।
" बहन जी। आपसे कुछ मांगने आयी हू। आप ही मेरी मदद कर सकती हैं। "
" आप ऐसा क्यों कह रही हैं। मेरे पास ऐसा क्या है जो आपको दे सकूं। फिर भी आप बेझिझक बताइये। मुझसे जो बन सकेगा, मैं करूंगी।"
आगंतुक महिला कुछ समय शांत रही। जैसे मन की बात को बाहर निकालने का साहस कर रही हो।
" शायद आप मुझे नहीं जानती। मैं लक्ष्मी की माॅ हू। लक्ष्मी जिसका विवाह आपके पुत्र के मित्र विशाल से होने जा रहा है। "
साध्वी का मुंह फटा का फटा रह गया। लगता है कि यह औरत कुछ पागल है। लक्ष्मी अति संपन्न परिवार की बेटी है। और इस औरत की स्थिति तो ऐसी लगती नहीं ।
" लगता है कि आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है। पर यह सत्य है कि लक्ष्मी मेरी ही बेटी है। उसे मेने ही जन्म दिया है। यह सत्य केवल तीन लोगों को पता है कि लक्ष्मी किसी मंदिर की सीढी पर नहीं मिली थी। अपनी बेटी के बेहतर भविष्य के लिये मेने ही अपनी बेटी उन्हें दे दी थी। यह बात मैं आज भी किसी को न बोलती। पर मैं मजबूर हूं। अपनी बेटी को घुट घुटकर जीते नहीं देख सकती। लक्ष्मी के मन में तो संकल्प है। आज से नहीं, बल्कि बहुत समय से। पर वह कह नहीं पायी। अपने पालक माता पिता के सम्मान में कुछ बोल तो नहीं पायी। पर मुझसे छिपा भी नहीं पायी। आखिर मैं उसकी माॅ जो हूॅ। "
उसके बाद दो बच्चों की वास्तविक माताएं बहुत देर तक रोती रहीं। दोनों ही माताओं को अपने बच्चों के मन की बात पता है। कोई भी चाहे कितना भी सुख सुविधा जुटा दे पर माॅ का दिल केवल माॅ के पास ही होता है। आज दो माताएं अपने बच्चों को उनका प्रेम दिलाने के लिये गुपचुप मंत्रणा कर रही थी। संकल्प की माॅ का यह तर्क कि लक्ष्मी को इस परिवार में निभने में दिक्कत आयेगी, लक्ष्मी की माॅ ने खारिज कर दिया। इसके बाद भी दोनों किसी नतीजे पर पहुंच नहीं पायीं। दो सच्चे प्रेमियों का मिलन तभी संभव है कि जब कि कोई सच्चा प्रेमी ही इस विषय में उनकी मदद करे। और ऐसा सच्चा प्रेमी कहाॅ मिलेगा, यह दोनों महिलाओं को पता नहीं है।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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