मिलता नहीं निर्मित करना होता है जीवन,
जो मिलता है वो जीवन नहीं केवल जन्म है,
तरतीब से छूने होते है संगीत के सब तार,
बस यही जीवन की वीणा का मर्म हैl
सही वादन न सीख पाये अभी,
तभी तो इतनी उदासी,पीड़ा और दुःख घनेरा है,
घृणा, हिंसा, वैमनस्य, शत्रुता से,
जग में इतना अंधेरा हैl
हो चला विसंगीत जो होना था संगीतमय,
पर रँग रोगन ही सीखा वीणा का और कुछ फूल ,
कुछ हीरे- जवाहरात जड़ दिये,
हीरे -मोतियों से कभी बजती नहीं वीणा,
बिना यह ध्यान एक पल भी कियेl
सजी हुई अलंकृत वीणा प्यास,अहंकार देती है,
देती है महत्वाकांक्षायें,
और पड़ी रह जाती है बिन छेड़े तब यह ,
जब प्रारंभ होती है प्रथम आने की अंध प्रतियोगिताएंl
तभी जीसस ने कहा धन्य है वो
जो अंतिम पँक्ति में समर्थ है खड़े होने में,
क्योंकि अंत में खड़े होने के अर्थ बड़े होते है,
बजाते है बड़ी तल्लीनता और तत्परता से सुमधुर,
सुंदर जीवन वीणा, जो औरो को पछाड़ते नहीं, सँवारने व उबारने के हेतू ही जीवन जीते है l
-निगम झा
स. उप- निरीक्षक
स. सी. बल
सिलीगुड़ी

0 टिप्पणियाँ