बढ़ जाता है जब धरती पर
पाप और अधर्म का अत्याचार,
तो धर्म की स्थापना के लिए
होता है ईश्वर का अवतार।
पंच तत्वों से बना ये शरीर मानव का
जब अपनी सीमा भूल जाता है,
तो फैल जाता है प्रकृति में असंतुलन
और भयंकर तबाही का मंजर नजर आता है।
कभी सूखे के प्रकोप
उस पाप को जलाता है,
तो कभी बनकर बाढ़ तृण मूल सहित
उस पाप को बहा ले जाता है।
कहीं आती है भयंकर आपदा
भूस्खलन होता है,
तो कभी कोरोना जैसी न जाने कितनी
महामारी का प्रकोप सहना पड़ता है।
पापियों को दंड देने के लिए
ईश्वर कभी लाठी लेकर नही आता है,
धर्म,बल,बुद्धि का हरण कर
तबाही म मंजर लाता है।
अधर्म और अत्याचार बह जाता है तबाही की धार में,
सुख,शांति समृद्धि की स्थापना करते है ईस्वर संसार में।

शीला द्विवेदी "अक्षरा"