फूलों की खुशबू क्या देती,
क्या  तुमने कभी सोचा है?
खुशबू  ऐसी  मन बहलाती ,
बड़े कार्य वह कर जाती  है।।

नारद  पारिजात  दी कृष्ण को,
रही अलौकिक खुशबू जिसकी।
कृष्ण  ने  दी उसे रुक्मिणी को ,
क्रोधित हुई सत्या तत्काल  ही।।

असहाय कृष्ण तब की चढ़ाई,
स्वर्ग  से  पारिजात तरु   लाये।
सत्या के  भवन  में  वृक्ष  रोपी,
इस  जग  को  पारिजात  दिये।।

पाई जब सुगंध दिव्य कमल की ,
द्रौपदी     कही    उसको   लाने।
चले  भीम  दिक्  गंधमादन  की,
जहां अग्रज  हनुमान  थे   मिले ।।

फूलों  की  सुगंध अति निराली,
क्लांत  को  विश्राम  कभी देती।
रोगी    को    वह    राहत   देती,
अपनों  को  खुशियां  वह   देती।।

फूलों की खुशबू अति न्यारी,
सदा  खुशी  ही  है वह  देती।
कभी कभी  खुशबू  फूलों की ,
एक   इतिहास  ही  रच  देती ।।


-पेरी सूर्यनारायण मूर्ती   "दिवाकर "