बंधी ना हो कलम किसी बंदिश में 
ना विषय का कोई पहरा हो 
बेड़िया ना हो भाषा की 
ना संहाई पर दाग गहरा हो 

बन्धनों को तोड़कर 
स्वतंत्रता से लिखने दो 
स्वछन्द हो खुल कर बोले 
ना समाज की रंजिशें हो 

ना कोई रोके ना कोई टोके 
खुद मे ही खुदी इतनी बुलंद हो 
छुए आसमाँ की ऊंचाइयो को 
ना तूफानों से हौसला पस्त हों 

रूबरू कराने दो समाज में 
फैली बुराइयों से 
आईना दिखाने दो 
सफ़ेदपोश दगाबाजों को 

निष्ठुर बन बिन भेदभाव के 
कर्त्तव्य की राह पर चलने दो 
आलोचना के बवंडर मत  चलाओ
शब्दों के सागर में तैरने दो 

ना तौलो ऊँच - नीच 
 अच्छे - बुरे के पैमानों में 
फूल ,फूल होता हैं
जो खिलता हैं बागानों में 

शब्दों को आजाद परिंदा बन 
खुले गगन में उड़ जाने दो
सत्यार्थ मेघ बन अंबर में 
छा बरस जाने दो

इल्म नही हैं तुझें जब उतरता है
कलम का सिपाही मैदाने जंग में
रख सकता हैं पल में बादशाहों 
तख्ता पलट कलम की नोंक से

कलम की तेज धार से बच 
ऐ जुल्मों सितम ढाने वालो 
काट कर रख देगी तुम्हारा हाथ 
ऐ लाचारों से रिश्वत खाने वालों 

चलता है जब किसी पर 
कलम का हथियार 
ना कोई कुछ कर सकेगा 
सब हो जाये लाचार 

बन्धनों की जंजीरों को तोड़ 
आगे बढ़ने दो 
ना कोई रोक सके तूफान 
नया इतिहास रचने दो ।।

     " जय हिंद "  
    " जय भारत "

       ..........@ नेहा धामा " विजेता "