तू शब्दों में
वर्णों की तरह
मुझमें शामिल हैं।
व्याकरणिक नियमों से
तू कभी कभी
संधि-समास में
परिवर्तित हैं।
उपसर्ग की तरह
कभी तू आगे
लगकर मान बढ़ाता है।
प्रत्यय की तरह
कभी पीछे से
सहारा बनता हैं।
अलंकार बन
तू मेरी
शोभा को सजाता हैं।
कभी छंद बन तू
जीवन में गीत
सुनाता है।
कभी अमिधा
सा सरल
कभी लक्षणा में
बदल
व्यंजना में
व्यंग्य कस जाता हैं।
पर फिर भी तू
नौ रसों की तरह
मुझे रसों से भर जाता हैं।
कभी किसी काल में
तू विलोम हो जाता हैं
पर तेरा पर्याय
कही नजर नहीं आता हैं।
मुहावरों सा टेढ़ा
लोकोक्तियों सा ज्ञान देता हैं।
शब्दों को मेरे
वाक्य में बदल कर
तू मेरा
पद-परिचय बन जाता हैं।
गरिमा राकेश गौत्तम
खेड़ली चेचट कोटा राजस्थान

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