" सूरज सर पर आ गया। अब तो उठ जाओ बिटिया।" 

  नींद तो लक्ष्मी की पहले ही टूट चुकी थी। पर सपनों की दुनिया से बाहर नहीं आना चाहती थी। पर जब माॅ ने उठाया तो स्वप्न लोक से वापस धरा पर आ गयी। वैसे भी सपने कब सच होते हैं। सपनों में मनुष्य न जाने क्या क्या देखता है। पर वास्तविकता में वह मुमकिन नहीं होता है। 

  लक्ष्मी शहर के माने वकील सुदर्शन की इकलौती बेटी, रूप और गुणों से संपन्न, किसी भी नवयुवक की नींद उड़ा देने में सक्षम, आजकल खुद नींद में किसी के स्वप्न देख रही थी। स्वप्न लोक में किसी से वह खुद प्रणय का निवेदन करती। किसी के साथ जीने और मरने की कसम खा रही है। 

   पर वास्तव में जब स्वप्न बाला नवयुवक उसके सामने आता तो उससे बोल भी नहीं पाती। हया स्त्री का गहना होती है। संकोच रूपी आभूषण लक्ष्मी की सुंदरता को और भी बढा देते थे। 

    सुदर्शन शहर के माने हुए वकील , न्यायालय में उनके हुनर की धाक थी। कानून की किताबें तो उन्हें कंठस्थ ही थीं। अपने कानूनी ज्ञान से वह फरियादियों की पहली पसंद थे। 
  
    सुदर्शन अपने पिता शुभचरण के इकलौते पुत्र थे। किसी समय शुभचरण जी के पिता जी पूरे पचास गांवों के जमींदार थे। अब स्वतंत्र भारत में जमींदारी तो रही नहीं। फिर भी उनके पास अकूत संपत्ति थी जिसके इकलौते वारिस सुदर्शन ही होंगें।.       

   उचित समय पर सुदर्शन का विवाह बहुत सुंदर, संस्कारी और उन्हीं की तरह समकक्ष खानदान की बेटी सुलक्षणा से हो गया। सुलक्षणा ने अपने मृदुल स्वभाव से सभी को वश में कर लिया। बड़े घरों की बेटियां, स्वभाव में भी बड़ी ही होती है। 

   सुदर्शन का जीवन खुशियों से भरा दिखता। पर अंधेरा भी दीपक के नीचे ही होता है। सुखों की बहुलता में भी निःसंतानता का दुख सुदर्शन व सुलक्षणा के मन को कष्ट पहुंचाता रहा। 

   इस दौरान दोनों ने कितने ही मंदिरों के चक्कर काटे। कितने ही दरगाहों पर मत्था टेका। कितने ही दान धर्म किये। पर ईश्वर की नाराजगी दूर नहीं हुई। 

  दोनों के विवाह को सात साल बीत चुके थे। तब उनके जीवन में लक्ष्मी का आगमन हुआ। लक्ष्मी जिसे संसार सुदर्शन बकील की बेटी तथा शुभचरण जी की नातिन के रूप में जानता है, की कहानी और भी अनोखी है। सुना जाता है कि वह सुलक्षणा को मंदिर की सीढियों पर मिली थी। वैसे वकील साहब ने पुलिस को खबर भी की। पुलिस ने अपने स्तर से जांच भी की। पर उस बच्ची के माॅ बाप किसी का पता न चला। वकील साहब व सुलक्षणा ने उस कन्या को ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार कर लिया। आखिर ईश्वर के दर पर इसी लिये तो बार बार जाते थे। 

  वैसे सुदर्शन के अधिकांश रिश्तेदारों ने उनके इस निर्णय का विरोध किया था। एक छोटी लड़की किसी का पाप बतायी जा रही थी। पर वकील साहब व सुलक्षणा अविचल रहे। उन्हें अपने पिता शुभचरण का भी साथ मिला। 

   विरोध तभी तक विरोध रहता है, जब तक उससे कोई डर रहा हो। निर्भय व्यक्ति को किसी का विरोध डिगा नहीं सकता। कुछ रिश्तेदारों ने  रिश्ते जरूर समाप्त किये। पर इससे वकील साहब का कोई नुकसान नहीं था। यह दूसरी बात है कि मतलब के लिये रिश्ते रखने बाले लोगों ने दुबारा वकील साहब से मित्रता की। 

  बेटी के पैर जैसे ही सुदर्शन जी के घर में पड़े, तो थोड़े समय में ही अनेकों खुशियां घर में दस्तक देने लगीं। शुभचरण जी की जायदाद के पुराने विवाद का फैसला उनके पक्ष में हो गया। सुदर्शन जी की वकालत ज्यादा चलने लगी। और तो और, इतने सालों से जिस सुलक्षणा की गोद भर नहीं रही थी, वह भी गर्भवती हो गयी। इसी लिये बेटी को लक्ष्मी मानने लगे। 

   आज इतने वर्ष बीत गये। लक्ष्मी पर सुदर्शन, और सुलक्षणा का प्रेम अपने निजी पुत्र रवि से कम नहीं है। वैसे दोनों कभी नहीं चाहते थे कि लक्ष्मी को उसके जीवन की सच्चाई पता चले। पर जिस बात को मनुष्य छिपाता है, वह खुद व खुद सामने आती है। पर इससे लक्ष्मी के मन में अपने पालक माता पिता का मान ज्यादा बढ गया। लक्ष्मी माता पिता की हर बात मानती है। 

  लक्ष्मी कुछ समय से परेशान है। इन स्वप्नों ने उसकी नींद हराम कर रखी है। पर उससे भी ज्यादा चिंता की बात है, लक्ष्मी का अपने पालक माता पिता से स्नेह। वह अपने पिता और माता की मर्जी के बिना कोई भी निर्णय नहीं ले सकती। उसे लगता ही नहीं कि उसे खुद के जीवन के विषय में भी निर्णय लेने का अधिकार है। बेटियों का भविष्य तो उनके माता पिता ही बनाते हैं। फिर जिन्होंने उस अनाथ लड़की को खुद की बेटी जैसा स्नेह दिया, उन्हें दुखी कर वह कभी भी सुखी नहीं रह सकती है। दूसरी तरफ उसे यह भी नहीं मालूम कि जो उसके सपनों का हिस्सा बन रहा है, वास्तव में उसके मन में क्या है। दुबिधा की ऐसी घड़ी में लक्ष्मी रोज अपने आराध्य से यही प्रार्थना करती कि उसे सपनों से मुक्ति मिले। पर वह जितना ईश्वर को मनाती, परिणाम उतना भी उल्टा होता जाता। लगता है कि ईश्वर के हर विधान का कोई अर्थ है। और लक्ष्मी को दिख रहे सपने भी बेबजह तो शायद नहीं हैं।

  क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'