' ऐ विजइया .... खैनी दें ......... खैनी चाही हमरा .... जब तुम्हारे घर के दरवाजे पर सारा गाॅंव इकट्ठा होकर यह तमाशा देख रहा था कि तेरी माॅं विजय चाचा से खैनी माॅंग रही थी उस समय वही औरत तेरी माॅं के पक्ष में खड़ी हुई थी और उसी वक्त घर की इज्ज़त उछालने वाले को करारा जवाब दिया था । सारे गाॅंव वाले जब तेरी माॅं को भूत-प्रेत का साया मान कर उनके पास आने से डरते थे .. सारे गाॅंव में अफवाह फैल गई थी कि तेरी माॅं पर तेरे मृत पिता का साया आ गया है और वह अजीबोगरीब हरकतें करती रहती है उस समय भी वही औरत थी जिसने गाॅंव वालों को अंधविश्वास के भंवर से निकाला था और एक महीने की भाग-दौड़ और अपनी देख - रेख में तेरी माॅं को पूर्ण रूप से स्वस्थ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी । तुम्हें याद नहीं क्योंकि तुम उस वक्त पाॅंच बरस के हुए थे लेकिन तुम्हारी माॅं को तो सबकुछ मालूम है फिर भी उन्होंने उस औरत के किए को पूरी तरह भूला दिया ।'
यह कहते हुए नवीन का गला भर आया ।
' जब भी चाची से बात करो वह तीस साल पुरानी बातें कहने लगती है ... तुम्हारे बाप ने यह किया ... तुम्हारी फूआ ने यह किया .. तुम्हारी माॅं ने यह कह किया .. वह किया ... यें .. वों ... यह सब ही अगर मैं सुनता रहूं तो हो गया मेरा कल्याण । ' रौशन की आवाज आई ।
' तुम्हें वह तीस साल पुरानी बातें लगती हैं लेकिन उस औरत के लिए जरा सोचो वह उसकी जिंदगी के ऐसे दिनों की याद दिलाते हैं जिसमें उसे सिवाए दुःख और तकलीफ के कुछ हासिल ही नहीं हुआ था फिर भी वह अपनी तकलीफ को दरकिनार करते हुए एक समय ऐसा आया जब वही औरत पूरे परिवार को साथ लेकर चली। ' नवीन के इन शब्दों में अपनी माॅं के लिए गर्व की अभिव्यक्ति थी ।
' इस बात को मैं भी मानता हूॅं लेकिन बार - बार वही पुरानी बातें दुहराना जिसमें हम दोनों भाई थे भी तो इतने छोटे कि हम दोनों को कुछ याद भी नहीं है । ' रौशन की आवाज तीव्र थी ।
' इस बात को मानते तो हो लेकिन दिल से नहीं । अभी भी तुम्हारे दिल में बहुत सारी ऐसी बातें बैठा दी गई है जिनका यथार्थ से कुछ लेना-देना ही नहीं है । तुम्हें तो मालूम ही नहीं । सत्य कहा तुमने ... जब यह सारी बातें घटित हुई तो तुम दोनों भाई बहुत छोटे थे । इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि तुम्हें कुछ याद नहीं है । सादे कागज पर ही तो हम अपनी मुताबिक बातें लिख सकते हैं जो लिखें हुए कागज पर संभव नहीं । तुम दोनों भाई के कोरे दिमाग में जो कुछ भरा गया उसका स्पष्ट प्रमाण अब तुम दोनों की बातों में झलकने लगा हैं । ' नवीन की कही बातों में क्रोध झलक रहा था ।
' हम दोनों भाई पढ़ें - लिखें हैं । हमें कोई बहका नहीं सकता । ' रौशन की बातों में अहंकार लिप्त थी ।
' कोई अगर बहका नहीं सकता तों एक पक्षीय बातों पर विश्वास क्यों हैं ? हरेक सिक्के के दो पहलू होते हैं और यह दोनो देखने में एक-दूसरे से जुड़े प्रतीत होते हैं लेकिन होते एक-दूसरे के विपरित ही है । अपनी माॅं का पक्ष अर्थात सिक्के का एक पहलू तो तुमने जान लिया या यूं कहें कि तुम्हारे दिलो-दिमाग में बैठा दिया गया लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू तुम्हें जो बताया गया वह सही है या ग़लत , इसका निर्णय तुमने किस आधार पर कर लिया ? कभी यह जानने की कोशिश भी की तुमने , जो मुझे बताया गया है इसके विपरित भी उस घर का इतिहास हो सकता है । ' यह कहकर नवीन ने गहरी सांस ली ।
' और हाॅं ! तुम कहता है कि तुम घर की साफ-सफाई करता है तो क्या इससे पहले उस घर की साफ-सफाई नहीं होती थी ? ' नवीन के स्वर में गुस्सा था ।
' होती थी .. क्यों नहीं होती थी , बिल्कुल होती थी । ।' रौशन का जवाब था ।
' तों फिर इस तरह की बातें करने का क्या औचित्य है ? तुम वहाॅं रहता है तो सफ़ाई कर दिया तो कौन-सा बड़ा काम कर दिया । सफाई उस समय भी होती थी जब घर के चारों तरफ केले के पेड़ों का अंबार था और लोग भूत .. भूत का झूठा हल्ला मचा कर दिन में भी वहाॅं आने से डरते थे । हम दोनों भाई ने घर को उस लायक बनाया कि लोग अब रात में भी बेफिक्र आतें - जातें हैं । जब हमारा परिवार शहर आ गया उसके बाद भी हम वहाॅं जाकर घर के आस-पास की साफ-सफाई करतें थें और तुम दोनों भाई हमारे पीछे - पीछे खेलते रहते थे । ' नवीन की ऑंखें अतीत के गर्भ में छुपी संस्मरण को देख रही थी ।
' आपको गलत कहा गया है , मेरे कहने का वह मतलब नहीं था । ' रौशन ने सफाई पेश की ।
' मतलब कुछ भी हो लेकिन यह तुम्हारे द्वारा कहें गए शब्द है इसकी पुष्टि तो कम से कम तुमने की । मैं भी बहुत कुछ ऐसा जानता हूॅं जो आज कह दूं तो पंचायत बैठ जाएं लेकिन मैं अपनी मर्यादा को जानता हूॅं । तुम्हारे पिता और मेरी उम्र में सिर्फ दस साल का ही अंतर था । वह मुझसे बहुत सारी बातें कहते थे । वर्तमान पीढ़ी में घर का बड़ा बेटा मैं ही था । जब तुम्हारे पिता रात के अंधेरे में , नशे में चूर , गिरते - पड़ते दरवाजे तक पहुॅंचते थे तो उन्हें संभालने वाला मैं ही होता था । लोग कहते हैं कि नशे की हालत में बोला गया शब्द सत्य ही होता है लेकिन आज तक मैंने तुम्हारी माॅं को ऐसा कोई शब्द नहीं कहा जिससे उन्हें लगें कि मैंने अपनी संस्कारों और मर्यादाओं की बेड़ियों को अपने फायदे के लिए कभी तोड़ा हो । जो इज्जत और मान-सम्मान उन्हें मेरी तरफ से मिलनी चाहिए वह आज तक मैं उन्हें दें रहा हूॅं और तुमने क्या किया ? मेरी माॅं को कहा कि " मैं औरतों से बात नहीं करता " । ' नवीन की ऑंखें और बातें दोनों में नमी छाने लगी ।
' मेरे यह कहने के पीछे यह वजह थी कि औरतों को घर के अंदर के फैसले लेने चाहिए । घर के बाहर के फैसले हम मर्द देख लेंगे । इसमें औरतों को बिल्कुल भी नहीं पड़ना चाहिए ।' रौशन की बातों में मर्द होने का गर्व झलकने लगा था ।
' आज जिसे तुम कह रहा है कि उसे घर के अंदर के ही फैसले लेने चाहिए अगर वह उस दिन बाहर आकर उन लठैतो को नहीं रोकती तो तेरे पिता और घर की इज्ज़त उस दिन नहीं बचती । इस सच्चाई को किसी ने बताया तुम्हें ? । ' नवीन ने प्रश्न किया ।
नवीन को अपने द्वारा किए गए प्रश्न का उत्तर चाहिए था और रौशन को कोई भी उत्तर नहीं समझ आ रहा था । इस स्थिति में दोनों तरफ मौन पसर गया ।
' जिस चाची को तुम आज औरत कहकर संबोधित कर रहे हों , वही औरत तुम्हें गोद में खेलाई हुई है । तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा करने में तुम्हारी माॅं से कम योगदान उस औरत का नहीं है । आज तुम जब कमाने लगा है तों चाची तुम्हारे लिए औरत हो गई । चाची का किया सब-कुछ भूल गया तुम । आज जब तुम अपनी चाची को औरत कह रहा है तो कल को अपनी माॅं को भी औरत कहकर ही बुलाएगा । ' नवीन ने वातावरण में फैले मौन को तोड़ा ।
' ऐसा दिन कभी नहीं आएगा ।' रौशन की बोली में धीमापन था ।
रौशन की बोली में धीमापन होने के बावजूद भी इसे नवीन ने स्पष्ट रूप से सुन लिया था ।
' तुम कह रहा है , तुम्हारी माॅं को औरत कहने वाला दिन तुम्हारी जिंदगी में कभी नहीं आएगा और मेरी माॅं को औरत कहने वाला दिन तुम्हारी जिंदगी के छब्बीसवें साल में ही आ गया ' । नवीन की बोली की तीव्रता बढ़ने लगी थी ।
' औरत कहने के पीछे मेरा मकसद क्या था ? यह मैंने स्पष्ट कर दिया है । ' रौशन के स्वर भी तेज होने लगे थे ।
' आज जो तुम्हारे इर्द-गिर्द तुम्हारे हितैषी बनकर घूम रहे हैं वह उस समय भी थे जब तुम्हारे पिता को मदद की जरूरत थी और यही हितैषी उस समय अपने - अपने बिलों में घूसे पड़े थे । उस समय वही औरत थी जिसने अपने पर किए सारे अत्याचारों को भुला कर तुम्हारे पिता और तुम्हारे परिवार की मदद की थी । उस दिन अगर वह औरत तुम्हारे पिता और तुम्हारे परिवार को छोड़ देती तो जिस स्थिति में आज तुम हों ऐसा दिन कभी नहीं आता । ' नवीन गहरी सांस लेकर बोला ।
' मैं मानता हूॅं ! चाची ने यह सब किया लेकिन हर वक्त वही पुरानी बातें । ना ही मुझे वह सब कुछ याद हैं और ना ही हम सब अब यह सुनेंगे । ' रौशन बोला ।
' चलों ! मानता हूॅं कि उन्होंने बोला और हर वक्त बोलती है , पुरानी बातें कहकर तुम लोगों को परेशान करती रहती है लेकिन तुम उनसे ऐसे बात करेगा ?
एक वह माॅं होती हैं जो पहले तों अपनी कोख में अपने बच्चे को नौ महीने रखती हैं और दर्द को सहन कर अपनी औलाद को जन्म देती हैं , वह माँ ही होती है जों नौ महीनों के साथ के बाद अपने बच्चे के प्रति प्यार और अपनापन महसूस कर ताउम्र अपने फर्ज का निर्वहन करती है । इस त्याग और स्नेह को भुलाया नहीं जा सकता है। वह औरत तुम्हारे लिए तुम्हारी माॅं थी ।
परायी औलाद को दूध पिला कर , अपने हाथों से खिलाकर , अपनी कोख से ज्यादा ममता परोसने वाली वही औरत ही थी, जिसने तुम्हें और तुम्हारें भाई को ममता की छांव दी थी । हम सब भाई - बहनों से पहले तुम भाई - बहनों पर ममता बरसाई। वही औरत थी जिसने तुम्हें दूध पिला कर , पढ़ा - लिखा कर पैरों पर खड़े होने लायक बनाया । क्या तुम उस औरत जों तुम्हारी चाची है के दूध के कर्ज को उतार पाओगे ? ना तो जन्म देने वाली अपनी माँ के महत्व को और ना हीं लालन - पालन करने वाली माँ के योगदान को हम सभी को कम आँका जा सकता हैं । भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण
हमारे सामने इसका जीवंत उदाहरण है । उन्हें जन्म देने वाली देवकी माँ और उन्हें पालने वाली यशोदा माँ के निश्चल प्रेम को हर कोई जानता है । एक ओर यशोदा के नंदलाल तो दूसरी ओर देवकी नंदन भी वही कहलाते हैं । इसी से हम सबको पता चलता है कि माँ केवल माँ होती है फिर चाहे वह जन्म देने वाली हो या फिर बच्चें को पालने वाली । हम और तुम क्या , इस दुनिया का कोई भी शख्स माँ के महत्व को नकार नहीं सकता है । माॅं ही होती है जों अपने या पालने वाले बच्चे को दिल से लगाकर उसे अच्छे संस्कार देकर एक ज़िम्मेदार इंसान बनाती है। माँ तों केवल माँ होती है, चाहे वह बच्चे को जन्म दे या ना दे । भगवान ने भी उसका दर्जा बच्चे के लिए हमेशा भगवान के बराबर हीं दिया है । भगवान विष्णु ने जब नर रूप में इस धरा पर जन्म लिया था उन्होंने माता कैकेई को अपनी जन्म देने वाली माॅं से भी अधिक प्रेम और सम्मान दिया था । माता कैकेई भी अपने पुत्र भरत से अधिक राम से स्नेह रखती थी , उन भगवान राम से जों उनके नहीं बल्कि महारानी कौशल्या के पुत्र थे । आज तुमने पालने वाली माॅं समान चाची को अपनी कटुता भरी बातों से बहुत रूलाया है । यह वही औरत हैं जिन्होंने बिना किसी फ़ायदे-नुकसान और बिना किसी लालच-लोभ के जीवन के इतने वर्षों की तपस्या कर हमारा और तुम्हारा लालन-पालन किया हैं । ' नवीन ने भावुक हो कहा ।
' मैं आपके द्वारा कही सभी बातों को जानता भी हूॅं और मानता भी हूॅं लेकिन आपके कहें शब्दों की सच्चाई की तरह यह भी सच हैं कि मैं अपने माता - पिता के खिलाफ कुछ नहीं सुन सकता हूॅं । मेरे पिता दूसरों के लिए लाख बुरे सही लेकिन मेरे लिए वह देवता तूल्य है । मेरे पिता के वैसा कदम उठाने के पीछे यह परिवार ही दोषी हैं । उन्होंने अवसाद में आकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और हम सबको पिता के सुख से वंचित कर दिया । किसी और का कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन हमारा परिवार तों बिखर गया । हमारे परिवार को बिखेर कर संभालने का झूठा नाटक किया गया । आज मैं , मेरा भाई , मेरी बहन और मेरी माॅं खुशी और एशो-आराम की जिंदगी जी रहे हैं तों हमारी मेहनत और समझदारी की बदौलत ही हैं । रही बात मेरे पापा जी और हम सबको पढ़ाने की और हमारी परवरिश की तों परिवार का प्रत्येक बड़ा सदस्य अपने से छोटे सदस्यों के लिए हर कोई करता है , यह कोई नई बात तों नहीं । यह तों बड़ों का फर्ज होता है । हमारे लिए हमारे बड़ों ने अपना फर्ज निभाया , मैं भी तो अपने छोटे भाई को आज पढ़ा कर उसका खर्च उठा रहा हूॅं , इसका मतलब यह तों नही कि मैं पूरे समाज में इसका ढिंढोरा पीटना शुरू कर दूं और कल को इसके बच्चों को मैं उलाहना देता रहूं कि तुम्हारे पिता को मैंने यह किया ... वह किया .. सब कुछ मैंने ही किया । मैंने माना कि उनके जलने के बाद उनका डाॅक्टरी इलाज का पूरा खर्च चाचा-चाची ने ही उठाया लेकिन उन्होंने इस समाज को दिखाने के लिए ही तो यह सब किया था और इस सबके बावजूद हुआ क्या ? आज इस दुनिया में मेरे पिता तों हैं ही नहीं । यदि उनका बेहतर इलाज कराया बेहतरीन जगह पर कराया जाता तों हों सकता है आज वह हमलोगो के साथ होते और हमारे पिता का हाथ भी हम सबके सिर पर होता । ' गुस्से में रौशन आग-बबूला होकर बोल रहा था जिसकी तपिश सामने फोन पर नवीन को भी महसूस हो रही थी ।
' तुम सबको कौन - सी घुट्टी पिलाई गई कि सारा किए कराए को अलग ही रूख में लेकर जा रहें हों । माना कि अपने से छोटे भाई के लिए कुछ भी करना फर्ज होता है और उस फर्ज को तुम भी निभा रहा है । चलों ! मान लेते हैं कि इसमें कोई नई बात नहीं है, तुम कर रहे हों , सब करते हैं तों उस औरत ने किया तो उसने सिर्फ अपना फर्ज निभाया , यह भी मैं मान लेता हूॅं लेकिन जिस दिन तुम्हारा छोटा भाई शराब के नशे में आकर घर में हंगामा करेगा और तुम्हारी पत्नी को अपशब्दों की बारिश में भिंगोकर उसे रोने के मजबूर करेगा और तुम उसे माफ़ कर अपने बड़े भाई के फर्ज का निर्वहन करता रहेगा उस दिन मैं तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को अपने फर्ज को निभाने के लिए शाबाशी देने जरूर आऊंगा । ' नवीन की भी बातें उनकी माॅं के प्रति इन लोगों की सोच सुनकर गुस्से में तब्दील हो चुकी थी ।
फोन पर कुछ देर की चुप्पी छाई रही । इस चुप्पी को नवीन ने ही तोड़ा और अपने चचेरे भाई रौशन से कहा :- ' मेरी माॅं जिसे तुम औरत कहने से पहले उनके बारे में तनिक सोचना भी नहीं चाहता , तुम्हारे दिल में उनके लिए न ही तों कोई इज्जत ही बची है और ना ही कोई मान-सम्मान । ऐसे में हमें शांति से पाॅंच पंचों के साथ बैठकर ज़मीन - जायदाद का बंटवारा कर अलग हों ही जाना चाहिए । एक ही खानदान के खून होने के बावजूद भी जब बड़ों के लिए वह औरत , वह मर्द , वह लड़का-लड़की इत्यादि शब्दों का प्रयोग हम अपने मन में उनके प्रति बुरी भावना रखकर करते जा रहे हैं तों समाज के सामने संयुक्त परिवार होने का दिखावा ना ही किया जाए तो वही हमारे और तुम सबके लिए अच्छा होगा क्योंकि एक बार तों मैं तुम्हारे मुॅंह से अपनी माॅं के लिए औरत शब्दों का इस्तेमाल सुन ही चुका हूॅं लेकिन अगली बार भी मैं सुनकर चुप रह जाऊं , ऐसा बिल्कुल भी नहीं होगा ।'
फोन कट चुका था । दोनों तरफ चुप्पी थी । अपने बड़े भाई के कहें शब्दों को समझने की कोशिश करता रौशन के दिल में अब भी अपने द्वारा कहें शब्दों का कोई पछतावा नहीं था । आगे भी वह अपने बड़े भाई को जवाब देने के लिए तैयार था ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
" गुॅंजन कमल " 💗💞💓

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