संग चलते नहीं एक भी कदम, न मिलाते स्वर से स्वर
गर कोई जो हो जाए खड़ा अन्याय के विरुद्ध 
 कुछ कहने को, कुछ कर गुजरने को 
अत्याचारों का सैलाब पुरजोर कोशिशों से तैर पार करने को

 क्यों शेष हो जाते हैं अपने कोश  शब्दों से 
 और घरघराना, फुस फुसाना भी मुनासिब न समझती है स्वर ग्रंथियाँ
या फिर राह रोक लेती है मनो- मस्तिष्क की कुछ भ्रांतियाँ

और देती है सदा हो मूक , कर आंखें बंद सो जाओ 
जब तक नहीं ढाता कोई तुम पर जुल्म
न होता इन मुश्किलातों का तुम्हें  जरा भी इल्म

  अरे अपना दिन जब आएगा उस रोज देखा जाएगा 
या फिर क्या पता ये वक्त तुम्हारे जीवन में न आयेगा

पर याद रहे गर हो एक साथ आज हम ये कुरीतियाँ,ये अत्याचार जो रोक न पाएं तो कल 
हो आतिशबाजी सी यही चहुंओर मंडराएंगी
 छप्पर हमारा भी उस दिन ना बचेगा जब सारी बस्ती लपटों   में घिर जायेगी

और इस दावानल में झुलसती हुई हर पीढी़ रोज  किया करेगी हमसे ये प्रश्न
 सुलगी थी जब ये चिंगारी तो क्या बजा रहे थे तुम नीरो सी बाँसुरी या मना रहे थे इंसानियत की सुपूर्दे खाक पे ख़ुशीयों का जश्न?
   

                          निगम झा
                      उप- निरीक्षक, 
                        स. सी. बल
                         सिलीगुड़ी