मेरे हर सवाल का बनके,
वो जवाब आ गया है।
इन होठों पे मुस्कान,
हाथों में गुलाब आ गया है।
मुद्दतों से फिरता रहा मैं,
जिस तलाश में दरबदर,
उन आंखों देखिये आज,
वही ख्वाब आ गया है।
थरथराते हुये लबों पर,
ये दबी दबी सी हंसी,
प्यार मुझपर आज उन्हें,
जैसे बेहिसाब आ गया है।
उठा कर नजरों को जो,
यूँ गिरा लेते हो अक्सर,
नजरों से नजरों को,
जैसे आदाब आ गया है।
जो फूल भेजा था उन्हें,
इन ज़ुल्फों पे सजा हुआ देख,
हसरतों का मेरे भीतर,
इक इन्कलाब आ गया है।
⚘रंजन लाल⚘

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