दुश्यंत से रिश्ता तय हो जाने के बाद अब सुनंदा को एक एक दिन गुजारना मुश्किल हो रहा था। कितने वर्षों से उसे मन मंदिर में बसाये थी। पर आखरी समय पर ज्यादा उताबली हो रही थी। सचमुच प्रेम का रोग होता ही ऐसा है। अभी तक तो दुश्यंत के मन की बात ही पता नहीं थी। पर अब तो ऐसा लगता कि किसी उड़न खटौले पर बैठकर उड़कर वहीं पहुंच जाये जहाँ उसका महबूब है। महबूब के बिना एक दिन गुजारना मुश्किल हो रहा था।
वैवाहिक आयोजनों में शुभ ओर अशुभ का बहुत विचार किया जाता है। पंडित जी के अनुसार अभी इस साल तो विवाह संभव नहीं है। अब पूरे एक साल रुकना होगा। सत्य बात तो यह है कि ईश्वर भी प्रेमियों का इम्तिहान लेते हैं।
वह तो तकनीकी युग में दूरियां ज्यादा खलती नहीं हैं। दुश्यंत और सुनंदा के मध्य बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। दोनों ही दूसरे की पसंद को अपनाने की कोशिश कर रहे थे।
रात के समय सुनंदा दुश्यंत के ख्वावो में खोयी थी। सपनों में मिलने से कोई रोक तो नहीं है। सुनंदा देख रही थी कि वह दुश्यंत के साथ वर्फीली पहाड़ियों में घूम रही है। सफेद रुई जैसी वर्फ बड़ी सुंदर लग रही है। एक तरफ सुनहरा नजारा और दूसरी तरफ महबूब का साथ। मन में सोच रही थी कि कभी भी यह स्वप्न खत्म न हो।
मोवाइल की घंटी बजी।
" इस मोवाइल को इसी समय बजना था। कितना अच्छा स्वप्न था। टूट गया।" अनमने भाव से सुनंदा ने मोवाइल उठाया पर मोवाइल की स्क्रीन देखते ही भाव बदल गये। क्या सचमुच स्वप्न साकार होते हैं। अभी थोड़ी देर पहले जिसके ख्वाब देख रही थी, उसी का फोन था।
" सो रही थीं क्या? "
" अरे नही। अब तो मेरी नींद ही उड़ा ली आपने। सोते जगते बस आपका ही ख्याल रहता है। आपको ही याद करती हूं। बाई चांस अभी आप को ही स्वप्न में देख रही थी। वर्फीली पहाड़ियों पर आपका साथ। इससे बढिया भला क्या स्वप्न हो सकता है।इन फैक्ट अगर आपके बिना कोई और होता तो गुस्से में उसे कुछ तो सुना देती। "
दुश्यंत किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। कैसे बताये कि इतनी रात को क्यो फोन किया है। कैसे कहे कि अब बहुत दिनों वह कोई फोन नहीं कर पायेगा। अचानक उसे वर्फीली पहाड़ियों पर जाने का आदेश मिला है। ऐसी जगह जहाँ मोवाइल के सिग्नल गायब रहते हैं तथा यमदूत अक्सर विचरते रहते हैं। थोड़ी देर पहले ही माॅ को बड़ी मुश्किल से चुप किया था। सुनंदा भी उसे इतना प्रेम करती है। उसे कैसे बता पाऊंगा।
"सुनंदा। अगर मैं तुम्हें कई दिनों फोन न करूं। तो तुम्हें कैसा लगेगा।"
" यह भी क्या मजाक का समय है। इतनी रात गये मजाक के लिये फोन किया था।"
"नहीं सुनंदा। आई एम सीरियस। मैं एक ऐसी जगह जा रहा हू। जहाँ चारों तरफ वर्फ ही वर्फ है। हर समय मौत हमला करने को तैयार रहती है। मुझे जाना होगा। आखिर भारत माता की सेवा के लिये ही तो यह फौज जोइन की है। "
फिर शांति छा गयी। सुनंदा की आंखों से टप टप आंसू टपकने लगे।
" हलो सुनंदा। मुझे सुन रही हो या नहीं। "
" हाॅ हाॅ ।मैं सुन रही हू। आप जाइये। आखिर भारत माता की सेवा की बात है। "
" तुम कही रो तो नहीं रही। "
" अरे। नहीं तो। रोने की इसमें क्या बात है।"
" सुनंदा। अभी भी तुम्हारे पास समय है। कुछ बिगड़ा नहीं है। यदि तुम्हें अपना विचार बदलना हो तो बदल सकती हो। मुझे छोड़ किसी दूसरे से शादी कर सकती हो। "
इतना सुनते ही सुनंदा तिलमिला उठी।
" नहीं। मुझे समझाने की कोई जरूरत नहीं है। आप अपना फर्ज अदा करो। मैं इंतजार करूंगी। "
" सुनंदा। कई बार इंतजार कभी पूरे नहीं होते। जिंदगी भर आंसू बहाने से अच्छा पहले ही भूल सुधार ली जाये। "
" फिर वही बकबास। हर इंतजार पूरा होता है। हर फौजी एक दिन जरूर वापस आता है। कुछ सशरीर और कुछ सूक्ष्म शरीर से ।आप मेरे पास वापस आओंगे। मैं इतजार करूंगी।"
फोन कट गया। एक बार फिर से सुनंदा की आंखों से आंसुओं की बरसात होने लगी। अब वह उन्हें रोक नहीं रही थी। आंसुओं की नदी में मन की कमजोरी को बहा रही थी। आखिर वह भी एक फौजी की माशूका है। कमजोर नहीं पड़ेगी।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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