अखिर बच्चे और माँ बाप मे दूरी क्यों "
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आंगन मे न चिडियों का कलरव रहा न रही नौनिहालों के जीवन मे मुस्कान , अखिर क्यो जबाव दार कौन हम स्वयं या परिस्थिति परिवर्तन आज त्रासदी है की बच्चो को दोष देकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं माँ बाप, वो बच्चो को कितना समय देते है, चलो मान लिया समय दे भी दिया, तो बच्चो को क्या दिया, ममता प्यार या प्रताड़ना,
आज माना ऑनलाइन की दुनिया मे हर उम्र के लोग ज्यादा समय बीता रहे है, तो गलत क्या है, वहाँ कुछ सीख ही रहे है, जब हम खुद आधुनिकता मे जी रहे है तो हमारे बच्चे भी तो वही जीवन शैली अपनाऐगे जो हम जी रहे है,!
जब एक छोटा बच्चा एक महीने का,,,,,,सिर्फ लाल पीली रोशनी देखकर खुश होता है तो हम खुद सेल फोन उसकी आँखों के सामने ले जाकर दिखाते है रोशनी देखकर बच्चा खुश होता है तब उस बच्चे को सेल फोन के बारे मे कोई जानकारी नही होती, उस नन्हे से बच्चे को एक मात्र रोशनी से मतलब होता है!
जैसे जैसे बच्चा बढता माता पिता उसे मंहगे से मंहगे खिलौने मुहैया करते है,
बस वही से शुरू होता है, बचपन का अंत, माता पिता उन्है हर वो चीज देते है, जो आधुनिकता से लैस हो, और मन मे खुश हो जाते है हम अपने बच्चे को कितना प्यार करते है, !
पर क्या उस उम्र मे उस बच्चे को
जरूरत थी उन चीजो नही विल्कुल नही थी!
दूसरा पहलू जब बच्चे को गिफ्ट तौर पर एक गन दी जाती है तो बच्चा पूछता मा ये क्या है, बच्चे को टालने की गरज से बेटा ये गन है इससे दुश्मन को मारा जाता है उस उम्र मे बच्चे को पता भी नहीं होता दुश्मन अखिर किसे बोलते फिर वो अपने मन से अपने भाई बहन मे ही दुश्मन तलाशने लगता उस बच्चे को बस इतना ही उस समय बोलने की जरूरत थी "वो खिलौना है बेटा बस तो कम से कम बच्चे का मन दुश्मन की तस्वीर नही बनाता है, तीन साल का बच्चा माँ के पास आता है, माँ कुछ काम कर रही होती है, बच्चा कुछ मांगता है माँ न करती है वहाँ से जाने का बोलती है, बच्चा उस समय बस ये माँ ही दे सकती है मुझे, माँ की सोच उस समय बदल चुकी होती है, उसके अंदर ममता के बजाय अहम आ जाता है यदि उस समय बाहर का कोई व्यक्ति मौजूद होता है तो माँ सोचती है सबके सामने मेरा बच्चा मेरी बात नही सुन रहा, तो मेरी क्या इज्जत होगी लोग क्या सोचेगें, अभिभावक और बच्चा दोनो की मनोस्थिति अलग होती है, अभिभावक अंजाने मे बच्चे को तिस्कृत कर देते हैं या एक दो थप्पड़ भी मार देते है, जिसकी उस समय जरूरत नही होती, बच्चे का मन उस बात को स्वीकार नहीं पाता, और वो दूरी बनाने लग जाता है!
फिर उन चीजो को खुद करने की कोशिश मे लग जाता है!
कामयाब होता है तो शाबाशी मिलती,
नही होता तो तिरस्कार, सभी अभिभावक यही सोचते हैं की बच्चा सबसे आगे हो, फिर जो बच्चे आगे होते हैं उनसे कम्पीटीशन, भाई बहनों मे अभिभावक ही कही न कही बराबरी
गलत बीज बो देते है, छोटी बहन या बडी बहन अच्छी है तुम गंदे हो, फिर वो बच्चा फिर वो बच्चा खुद को साबित करने के लिए सही गलत सब करता है! उस बच्चे की सोच सिर्फ इतनी होती है, मै भी अच्छा बच्चा बनूँ,
फिर भी यदि अभिभावक उसे नही समझ पाते तो वो जिद करने लगता है,
अभिभावक सोचते है"की बच्चा हमे कुछ समझता नही, वो हर छोटी छोटी बातों के लिये डांटते या फिर मार भी देते है,! अभिभावक अपनी बात मनवाने की कोशिश करते है! बच्चा अपनी, कही न कही अभिभावक खुद जिद करके बच्चे को जिद्दी बना देते हैं!
फिर बच्चे की मनोस्थिति मे परिवर्तन होने लगता है वो अपने ही अभिभावको से दूरी बनाने लगता है! जो प्यार ममता उसे नही मिलती उसे वो बाहर तलाशने लगता है, या फिर नेट की दुनिया मे,
इसलिए बच्चो को दोष देने से पहले अभिभावकों को खुद के लिए मंथन करना होगा, क्योंकि कही न कही शुरुआत अभिभावक ही करते है!
बच्चे के सामने आपस मे लडना जिद पकडना ये सब बच्चा देखता है, उसका बालमन उन बातों को अपना लेता है,
जो देखता है,! फिर वो भी वही चीजे दोहराता है, तो उसकी भर्त्सना होती है, ऐसी छोटी छोटी बातें है जो अभिभावक समझना नही चाहते,
बच्चे समझ नही पाते, सबसे बडा कारण, माँ बाप और बच्चों की दूरी का, अभिभावक उनके बालमन को समझे बच्चे बडी बातें करते है तो वो बड़े नही हो जाते, वो बच्चे है उन्हें समय से पहले बडा न बनाये, उनका बचपना न छीने,,उनको समय दे, ताकि आने वाले समय मे ये प्रेम भी लुप्त न हो जाये, आपके बच्चे हैं, उन्हें समाज मे जीना सिखाये, आपका अंश है! समाज का अंश न बनाये!!
श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर लेखिका
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत

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