तिमिर रात्रि काल घिरी ,
आसमान पर श्याम व्योम हैं।
एकान्त अकेली नारी मंझदार,
सागर की हिलौरे चंचल प्रचण्ड।
2
बीच मझधार खे रही पतवार,
रह-रहकर दामिनी कडकडाती।
काली घटायें घड़-घड़ाये ,
सांसो का स्वर तेज हुआ।
3
समीर विरोधी गति दिखलाते,
लहरों का कलरव शोर मचाये।
मन विचलित तन कांप रहा है,
आत्मबल अडिग खड़ा है
4
लहरों की गति आक्रोशित उठ-गिरकर,
आगे बढ़ने से रोक रही है।
मन बेचैन अशांत हुआ है,
निशि दिग्भ्रमित राह करे है।
5
धीरज धर पतवार थाम बढ़ी हूँ,
जीवन संघर्ष में कूद गयी हूँ।
जब तक जीवन है,आशा भी है ,
धैर्य और संयम संग जंग लड़ूगी।
6
ईश्वर मेरी नैया पार करेगें,
किनारे तट तक साथ रहेंगे ।
मंजिल की राह भले दुर्गम हो,
दृढ़ता के साथ लहरों से लड़ूगी।
7
एक आस और विश्वास,
घोर तिमिर,घटाओ,
पवन विरोधी और विकट लहरें पथ न रोकेगी।
कर्म पथ पर निर्विरोध बढ़ूगी।
8
नारी का शृंगार धीर है,
दृढ़ता उसका उत्थान है।
त्याग तपस्या बलिदान बल है,
आशाओं का संचार मार्ग।।
---अनिता शर्मा झाँसी---
---स्वमौलिक रचना---

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