मैं गीत नहीं कोई लिखती ,
नारी मन की पीड़ा गाती हूं !
चुन-चुन कर आंसू के कतरों को,
एक एक शब्द बनाती हूं !
मैं गीत ............
नारी मन से लोगों ने ,
भावनाओं के खेल खेले हैं !
मर्यादा के नाम पर नारी ने,
मत पूछो क्या क्या झलें हैं !
जख्मों को छुपाती हैं श्रृंगार से वह,
मैं उस पर मरहम लगाती हूं !
मैं गीत .......
नारी ईश्वर की उम्दा रचना है ,
कभी इसको पढ़ कर तो देखो !
नारी रूप सृजन का है ,
मूरत प्रेम की गढ़ कर तो देखो !
कितने रूप है नारी के ,
मैं हर रूप से उन्हें मिलाती हूं !
मैं गीत ..............
नारी गहने-कपड़ों की ,
कभी नहीं भूखी है !
बस मान चाहती घर में ,
मिल जाए कहां दुखी है !
अभिमान नहीं कहना इसको ,
मैं हंसकर जीना सिखलाती हूं !
मैं गीत ..................
.......✍️ पिंकी मिश्रा

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