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मरी हुई ये मछली ही तो केवल।
जल धारा के साथ सदा बहती है।।

जिन्दा मछली ही ये जीवन भर।
धारा के विपरीत ही सदा बहती है।।

अन्याय कभी नहीं देखा जाता।
करना चाहिए इसका विरोध सदा।।

न्याय के साथ ही रहना केवल।
अन्याय हेतु बनें आप अवरोध सदा।।

स्वामी विवेकानंद ने सदा कहा।
सत्य मार्ग पर सदैव चलना सीखें।।

ईमान धर्म के संग ही ये जीवन।
जब तक जीवित रहें जीना सीखें।।

झुकना नहीं झुकाने की हिम्मत।
खुद में यह ताकत तो लाना होगा।।

कर्म व व्यक्तित्व ऊँचा रहे हमेशा।
ऐसा कृत्य विचार हमें बनाना होगा।।

जीता वही यहाँ शान से है हरदम।
जिसमे ढ़ंग से जीने का है दम होता।।

विदेशियों के पीछे भागें न हरदम।
अपने संस्कृति सभ्यता में दम होता।।

ये संसार तो एक रंगमंच है यारों।
अपना-2 पाट यहाँ करना ही होगा।।

विश्व गुरु बनने की शक्ति है हममें।
धर्म कर्म उच्च चरित्र से रहना होगा।।

रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव