क्षिति धरा वारि समीर
साक्ष्य बना इन्हें
मैं समर्पण करती हूँ।
प्रेम में तुम्हें
अपना सर्वस्व अपर्ण
करती हूँ।
यूँ ही नहीं है
समर्पण मेरा
सदियों का इंतजार हैं।
थार की तपती
धरा को
प्रेम बरखा का इंतजार हैं।
पुलकित कर दो
हृदय मेरा
तन-मन मेरा बहका दो
मेरे समर्पण को
कर स्वीकार
कुसुम मन को
कुसुमित कर दो।
गरिमा राकेश गौत्तम
कोटा राजस्थान