बात उन दिनों की है जब हमारी नई नई शादी हुई थी... होता है न अक्सर नई नवेली दुल्हन को लापरवाह समझा जाता है मुझे भी समझा जाता था।
     
        मेरे पति श्रावस्ती जिले में कार्यरत थे मैं भी उन्हीं के साथ रहती थी , कुछ कारणों से हमें अपने गांव चंदौली जिले आना पड़ा था , कुछ दिनों के बाद हमारी वापसी थी।

       हमलोग अपने गांव से श्रावस्ती के लिए निकल चुके थे ,सारा पैसा इन्होंने अपने पास रखा था ,मैंने कहा  "कुछ मुझे दे दीजिए मैं रख लेती हूं ... रास्ते की बात है अगर कुछ होनी अनहोनी होगी तो कुछ पैसे मेरे पास भी रहेंगे"  पर उन्होंने मुझे लापरवाह समझ कर मेरी बात नहीं मानी।

      हमलोग मुग़ल सराय स्टेशन पर पहुंचे और ये टिकट लेने चले गए ,कुछ देर बाद हमारी ट्रेन आई और हम अयोध्या तक के लिए सफर पे निकल गए ... उसके बाद हमें श्रावस्ती के लिए बस लेनी थी जो हमें बहराइच पहुंचाती ... फिर हमें भिनगा के लिए बस लेनी थी यानी कुल मिला कर अभी हमें दो बस और पकड़नी थी।

       लगभग हमनें एक या दो घंटे का सफर तय किया होगा कि एक स्टेशन आने पे मेरे पतिदेव कुछ खाने पीने का सामान लेने नीचे उतरे... वापस जब आए तो उनके चेहरे पे हवाइयां उड़ी थी... मेरा जी घबरा गया मैंने पूछा क्या हुआ तो इन्होंने कहा लगता है कोई मेरा पर्स मार ले गया

        अब मुझे काटो तो खून नहीं सारे पैसे चले गए ....., मेरे पास बस कुछ रेज़गारी ही थी अठन्नी और रुपए की.....,इतने में हम लोग वापसी के लिए भी कोई ट्रेन या बस नहीं ले सकते थे... काफी आगे आ चुके थे... अब हम क्या करेंगे... अभी रात भर का सफर था हम दूसरे दिन...दोपहर में एक या दो बजे अपने निवास स्थान पे पहुंचते... जल्दी जल्दी में साथ में कुछ खाने को भी नहीं लाए थे ...., मेरी हालत खराब हो गई, मुझे इन पे बहुत गुस्सा आया कि क्यों नहीं इन्होंने कुछ पैसे मुझे रखने को दिया... हमें आभास हो गया था कि.... जेब टिकट लेते वक्त ही कटी होगी।

       खैर बिना कुछ खाए पिए हमने अयोध्या तक का सफर तय किया , रात हो गई थी लगभग दस बज रहे थे हमलोग ने ट्रेन  को छोड़ दिया और रेलवे स्टेशन से निकल कर बस स्टॉप पे बस का इंतजार करने लगे जो लगभग दो बजे से चार बजे के बीच आती... कोई और दिन रहता था तो बस के इंतजार से पहले हमलोग पास के ढाबे से कुछ कहा लेते थे... पर आज...।

      एक तो भूख उपर से दिसंबर को महीना दुख, ठंड और भूख से मैं बुरी तरह कांप रही थी और रो भी रही थी... इनकी भी हालत कुछ ऐसी ही थी ... कुछ सहयात्रियों ने हमें देखा तो जाएजा लेना चाहा ...।

      मेरे पति थोड़े स्वाभिमानी हैं... हूं तो मैं भी मगर मैंने पतिदेव से कहा इन लोगो से वस्तुस्थिति बताएं ... पतिदेव झिझक रहे थे पर उनलोगो की अजीब नज़रों को जवाब तो देना ही था जो मुझ नवविवाहिता को रोते देख उनके मन में आ रहा था । पति देव ने सारी स्थिति बताई ...यहां तक कि उन्हें अपना नाम, पद ,निवास स्थान भी बताना पड़ा... उन्होंने बताया... इस उम्मीद में कि बहुत से सहयात्री ऐसे थे जो मदद कर सकते थे ,  पर... सब हमे अजीब नज़रों से घूरते ही रह गए ,किसी ने मदद नहीं की।
    
      रात  दो बजे लगभग बस आई , रास्ता सुनसान था , कुछ सवारी ही बचे थे यदि वे लोग भी चले जाते तो... ठंड की रात में अनजान सुनसान जगह पे हम लोग अकेले ही रह जाते तब खतरा और ज्यादा हो जाता ... यही सोच के इन्होंने बस के ड्राईवर से बात की कि किसी तरह वह हमें बहराइच पहुंचा दे... हमारे कुछ दोस्त वहां रहते हैं हम उनसे सहायता ले किराया दे देंगे । ड्राईवर तैयार तो ही गया पर बदले में इनकी घड़ी और अंगूठी रख लिया ये कह कर कि रास्ते में चेकिंग होगी तो मैं बिना टिकट यात्री बैठाने के जुर्म में पकड़ा न जाऊं , हमलोग मरते क्या न करते वाली स्थिति में थे।
      
     सुबह चार से पांच के बीच बस हमें बहराइच ले आई हमने कुछ चैन की सांस ली , सभी यात्री उतर रहे थे और हमें लग रहा था कि वे हमारी हालत को एंजॉय कर रहे हैं... मुझे लग रहा था जैसे इंसानियत खत्म हो गई हो ... नाम मात्र का किराया था जिसे चाहे तो कोई भी सहयात्री दे सकता था ... एक से एक मानिंद लोग थे। मैंने अभी तक ऐसी समाज की कल्पना नहीं की थी... 
यदि हमलोग उस स्थान पे रहते तो किसी को परेशान देख जरूर मदद कर बैठते बदले में हजारों की घड़ी अंगूठी गिरवी रखने नहीं देते ...।

      परन्तुआगे तो और भी अकल्पनिय घटित होने वाला था... मानव का एक और नीच व्यवहार देखने को मिला...  ड्राईवर और कंडेक्टर के मन में पाप आने लगा , मेरे पतिदेव ने कहा" कंडिक्टर मेरे साथ चले यहीं पास में मेरे मित्र का घर है में पैसे दिला देता हूं ( उस समय मोबाइल नहीं हुआ करता था कि झट से फोन गया और मित्र हाज़िर)"... पर दोनों के मन में बेईमानी थी वे घड़ी और अंगूठी देना ही नहीं चाहते थे यदि वे चाहते तो हमें लौटा सकते थे क्योंकि रास्ते में कोई चेकिंग नहीं हुई थी।
      
        ड्राईवर नहीं माना उसने कहा अपनी घरवाली को यहीं छोड़ दीजिए और आप जाइए ले आइए अभी दस मिनट में बस निकलेगी... उस समय कोई साधन नहीं दिख रहा था मित्र के यहां जाने के लिए .... सो जाने आने में चालीस या पैंतालीस मिनट जरूर लगता ..... ,हम निराश हो गए थे कि हमारे जेवर चले जाएंगे वो मेरे पापा की निशानी थी... मेरे सब्र‌ का बांध टूट गया... मैं जोर जोर से रोने लगी कि यदि ये मुझे इस बियाबान बस स्टैंड पर मुझे छोड़ कर दोस्त के यहां चले जाएंगे मदद लेने तो मेरे साथ कुछ भी हो सकता था... वैसे भी ड्राईवर और खलासी कि नजर ठीक नहीं लग रही थी ...  इन्होंने समझदारी का परिचय दिया और भले ही जेवर चल जाए ये मुझे छोड़ के नहीं गए।
       
       ठंड और दुख से मेरी हालत खराब हो रही थी , पास कहीं थोड़ी सी आग जल रही थी इन्होंने मुझे वहीं बैठाया अब तक इनके आंख में भी आंसू आ गए थे, भूख के मारे हमारी हालत और खराब थी..... ,मैं लगातार रोए जा रही थी इक्का दुक्का यात्री जो साथ आए थे और भिनगा भी जाने वाले थे हमारा तमाशा देख रहे थे ..., बस ड्राईवर भी बस में सोया था ... अब बस दस मिनट में नहीं खुल रही थी... वो भी हमारी हालत का फायदा उठा हमसे झूठ ही बोल रहा था
     
       मैंने उस वक्त अपने को और अपने पति को बहुत लाचार पाया वो लगभग सबसे मिन्नते कर रहे थे कि कोई अस्सी रुपए दे दे तो वो गहने छुड़ा लें पर इंसानियत तो जैसे मर चुकी थी... ,
    
      निराश हो के वो मेरे पास आए और मुझे देख मुंह फेर लिया ... कि मैं उनके आंसू न देख पाऊं... मैं अब भी रोए जा रही थी ... कहा गया है न कि जिसका कोई नहीं होता उसका ईश्वर होता है... ऐसा ही कुछ हुआ हमारे साथ ... एक लड़का लगभग तीस बत्तीस साल का मोटर बाइक से उस कड़कड़ाती ठंड में वहां आया और संयोग से हमारे पास आ आग सेंकने लगा ... मेरी स्थिति देख कर वह मेरे पति से पूछ ही बैठा " मैडम की तबीयत ठीक नहीं है क्या" ।
      
      मेरे पति ने जो सबसे मदद मांग कर थक चुके थे उस लड़के की बातों का जवाब नहीं दिया क्यूंकि वो मदद पाने की उम्मीद खो चुके थे । जब उस लड़के ने पुनःजोर दे के पूछा तो मैंने चिढ़ के कहा जैसे सबको बताएं हैं इन्हें भी बता दीजिए..., बाकी यात्री मुंह ऐसे छुपा रहे थे जैसे उन्होंने कोई अपराध किया हो... लग रहा था अभी उन सबकी अन्तर आत्मा जिंदा हो।
     
        इन्होंने भी एकबार सोचा ... "देख लेते हैं  इसे भी बताकर" उन्होंने जैसे ही बताया कि  हम किस मुसीबत में यात्रा कर रहें हैं और  अभी हमें और आगे जाना है ... उसने तुरंत आकलन कर लिया... तुरंत सौ का नोट आगे बढ़ा रिक्वेस्ट के साथ कहा भैया तुरंत अपनी घड़ी और अंगूठी ले आइए उसका किराया देकर और बाकी आगे के सफर के लिए रख लिजियेगा ... हमें तो जैसे भगवान मिल गए .. फिर भी झिझक महसूस हो रही थी ... वो सौ का नोट देख हमारे आंसू खुशी के आंसू में बदल गए ...
     
       मुझे याद है वो सौ का नोट लेते वक्त इनके हाथ कांपने लगे थे ,उसने बड़े अपनत्व से कहा  "भैया रख लीजिए मेरे पास और रहता तो मैं और देता पर ... मैं यहां अपने संबंधी को रिसीव करने आया था ... इतने जाड़े में मैं आ भी नहीं रहा था मुझे लग रहा था कि वो नहीं आएंगे ... और देखिए वो आए भी नहीं है .. मेरा मन फिर भी नहीं माना और मैं चला आया ... शायद उपर वाले ने मुझे यहां आपकी मदद हेतु ही भेजा है  ...।"

     इन्होंने उस पैसे से किराया चुकाया...बड़ी मुश्किल से हमारे समान हमें वापस मिलें और आगे के सफर के लिए हमने बाकी पैसे रख लिए ... तब तक जलपान की दूकानें खुल रही थी... भोर की पहर आ चुकी थी ... हमारे पास अब भी खाने के लिए कुछ नहीं था ... शायद उस लड़के को अंदाजा ही गया था... उसने अपनी क्रेडिट पे हमें चाय और जलपान भी कराया तब जाकर हमारी हालत विशेष तौर पे मेरी कुछ सुधरी ।
   
       हम आज भी महेश नाम के उस लड़के के शुक्रगुजार हैं जिसने हमें विपत्ति से निकाला ... वास्तव में इस तरह के लोगों की इंसानियत की वजह से ही धरती बची है।
...बाकी के सहयात्री मुंह छुपाते फिर रहें थे।

     मेरे पति की नियुक्ति बनारस हो गई, फिर हमारा मिलना नहीं हो पाया ...  मनीऑर्डर द्वारा हमने उनका पैसा वापस कर दिया लेकिन उन्होंने जो ऋण हम पर डाला है उसे हम कभी चुका नहीं पाएंगे ... ऐसे लोग बहुतों को इंसानियत का पाठ पढ़ा जाते हैं...उससे उऋण होने का एक ही तरीका मुझे समझ में आया कि हम हमेशा इंसानियत का परिचय दें बस...।

         वो लड़का हमारे लिए एक फरिश्ता बन के आया मैं अपनी कहानी के जरिए उसे फिर से शुक्रिया कहना चाहती हूं।
     ""हर घटना एक बड़ी सीख दे जाती है।""

                          कीर्ति रश्मि नन्द✍️
                                वाराणसी