"मुश्किल घड़ी में आश खोज पाएंगे क्या? 
 साथ,प्यार, लोगों का विश्वास खरीद पाएंगे क्या ?
जिन पैसों के खातिर ब्लैक कर रहे हैं दबाएं और सिलेंडर, 
मौत आएगी जब इन्हें, उनसे सांस खरीद पाएंगे क्या? "

           एकाएक नजर सोशल मीडिया में घूम रही इन पंक्तियों पर जा ठहरीl देखा ,पढ़ा और सोचा क्या इस संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति है जो इन प्रश्नों के समुचित उत्तर न दे पाए ?क्या कोई है जिसे यह ज्ञात न हो कि उसे " अमरत्व "नहीं मिला है? वह मानव है,जीव है,ईश्वर की बनाई एक नश्वर कृति। फिर इस अज्ञानता ने उसे कैसे आन घेरा  कि वह दूसरों के आंसुओं पर अट्टाहास करें, दूसरों की मजबूरियों से अपनी जेब में भरे और दूसरों के रक्त से सोलह श्रृंगार करेंl
          इसमें न तो कोई शक और शुबह नहीं कि हम मानव है दुनिया के सबसे बुद्धिमान जीवl बुद्धि अर्थात सोचने समझने की क्षमता और साथ ही विवेक भी,जो ना केवल बुद्धि का पूरक है बल्कि हमें सही और गलत में भेद करना भी सिखाता है और सत्यम शिवम सुंदरम का पथ भी दिखाता हैl आप सोच रहे होंगे मैं यह सब क्यों बता रही हूँ? इसमे आखिर नया क्या है? पर आज ये बताना बहुत जरूरी है क्योंकि हमें चीजों को देख के भी अनदेखा बनने की बहुत बुरी लत पड़ी हुई है l
          एक पुरानी कहावत है कि यदि मनुष्य की स्मृति में श्मशान में मिला ज्ञान(जहां मृतको व उनकी समाधियों को देखकर यह ज्ञान होता है कि एक न एक दिन सबकी यही गति होनी है )तथा मां के गर्भ में मिला ज्ञान (जहां अपने पिछले जन्म के कर्मो तथा फलों का स्मरण होता है ) सदैव रहे तो वह कभी बुरे कर्म नहीं करेगा पर विडंबना देखिये कि जैसे ही व्यक्ति वहां से बाहर निकलता है, इस संसार में रम जाता है फिर उसे कुछ भी स्मरण नहीं रहताl
           पर वर्तमान में जो स्थिति है उसमे हमें किसी श्मशान जाने की जरूरत नहीं है lआज हम जहां भी खड़े हैं, जिधर भी नजर जाती है हर तरफ श्मशान ही तो है अस्पतालों में लाशें, गाड़ियों में लाशें,सड़को पर लाशें,नदियों में लाशेंl घाटो और श्मशान में तो पैर रखने  तक की जगह न बची है l चारो तरफ त्राहिमाम मचा हुआ है पर आज हमें कोई ज्ञान नहीं हो रहा,कोई "विवेक" नहीं जग रहा,हम कर क्या रहे है इस कठिन विपदा में तो बस स्वार्थ ढूँढ रहे है l दुःखी मानवता को जिसकी भी अवश्यकता हुई उसी की काला बाजारी शुरू l कल तक कोरोना में अस्पताल के बेड, आक्सीजन सिलिंडर और रेमडेसीवीर ब्लैक कर रहे थे आज ब्लैक, व्हाईट और येलो फंगस के आते ही ऐम्फोटेरिसन -बी ब्लैक करने लगे। सदैव जन दुःख क्रंदन में लक्ष्मी के बंदन् की तैयारी l
           जो गए सो गए उनके जीवित परिजनों को नोंच खाने के भी कम उपाय नहीं है, कभी एंबुलेंस के नाम पे तो कभी चिता जलाने के नाम पे l जो इनकी लूट हेतू सक्षम नहीं है वो अपनो के शव व उससे जुड़े संस्कार गंगा मैया व उनकी शाखाओं को समर्पित कर तिलांजलि दे जाते है l ये नदियाँ इंसानी क्रूर कृत्यो पर आठ आठ आँसू बहाती कुछ को तो संग बहा ले जाती है और कुछ को अपना रेतीला आँचल ओढ़ा, नाम के चील-कौओं और सियारों से बचाने का प्रयास करती हैl इतने पर भी स्वार्थ थम जाता तो ठीक था पर अभी एक ताजी खबर ये भी आयी है कि जिस महिला के शव को अकेले उसकी बेटी को दफनाना  पड़ा उसके मृत्यु भोज में कम से कम डेढ़ सौ लोग शामिल हुए, माल मुफुत दिले बेरहम लगाओ कप पे कप। 
         कहते है  पुस्तक में रखी विद्या और तिजोरी में बंद धन, दोनों ही जरूरत के वक्त किसीके काम नहीं आते तो फिर हम कोई अनोखे तो है नहींl निश्चित है कि हमारे काम भी नहीं आयेंगे,इसलिए आगे से विपत्ति के मारो से अपनी स्वार्थ पूर्ति करने से पूर्व एकबार अवश्य सोचें कि ये दिन आपका और आपके परिवार का ही है क्योंकि प्रकृति का सिद्धांत तो गिव एंड टेक का हैl हाँ, उन्नीस- बीस जरूर करती है लेन देन में,पर वापस सबको मिलता है, राजा को भी और रंक को भीl वरना देखियेगा कहीं ऐसा न हो  कि आपको सांत्वंना के दो बोल सुनाने के दिन हमें, इंसानियत भी ब्लैक मार्केट से लानी पड़े,बड़े ही ऊँचे दामो में। 

       -निगम झा 
       सब इंस्पेक्टर, एस. एस. बी. सिलीगुड़ी