कहा था उसने-
एहसास किनारे रख दो-
हर मुश्किल आसां होगी,
उतरोगे जब सागर में संसार के-
तब मंज़िल तुम्हारी आस्मां होगी!
कहाँ टाला था कभी हमने उसे-
था भरोसा हमें हर बात का-
उसने कहा है तो सच ही होगा-
रख कर किनारे पर दिल अपना,
हम लहरों में उतरे थे जब
मुस्कुरा कर अलविदा कहा था उसने तब!
हम भी तो मुस्कुराए थे एक अंतिम बार,
कि दूर हो कर फिर न कभी मुस्कुरा पाएंगे,
हम निकले थे उस असीम के अंत की तलाश में
जानते थे, फिर लौट कर न आएंगे!
मिले एक जो लहरों से तो जाना हमने
जो भी कहा- सच कहा था उसने
सागर से मिल कर हमने खुद को आसमान में पाया था
तैरते रहे देर तक हम, कि खुश थे, डूब नहीं सकते थे
कि रूह के बोझ से जिस्म आजाद था,
आंखे तब भी खुली थी हमारी, और सुकून इतना था
कि प्राण सुरक्षित थे मेरे उस किनारे पर--
दगाबाज़ियों के दौर में भी ज़िंदा थे वो-- कि,
मेरे एहसासों पर मेरे देवता का महफूस साया था!
शालिनी अग्रवाल
जलंधर

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