जब काल लेत विकराल रूप, थर थर कांपे लोग 
व्याधि अकिंचन ही बढ़े, बढ़त जाए जब रोग 

काल की महिमा क्या कहूँ , जिससे बचा न कोय 
हे मनुज अब जान ले, क्यूँ तू रहता सोय

काल के सम्मुख सब झुके, चाहे कितना हो ज्ञानी 
सरल सौम्य सा चित्त रख, मत बन तू अभिमानी

काल के सम्मुख सब झुके, राजा हो या रंक 
जैसे विषधर सम्मुख पड़े, मार जाएगा डंक

इस काल के मर्म को,  समझ पाया न कोय 
जो इसको समझ जाय ,फिर चिंता काहे की होय

सत्कर्म के मार्ग को,  अपना लेना अब 
जब काल आ जायेगा,  क्या करोगे तब

किस चिंता मे पड़ गया,  काल की महिमा मान 
 जिसके आगे सब व्यर्थ है,  इससे बड़ा न कोई ज्ञान

आपका मुकेश "लखनवी"