निशा का अवसान होते ही
प्राची से लालिमा बिखेरता दिनकर
एक नई ऊर्जा संचारित करता
प्रफुल्लित करता मन उपवन
निद्रा का त्याग कर एक
नई भोर का आगाज़ कर
प्रकृति के अंक में समाहित
हर रचना से मुलाकात कर
खग विहंग के कलरव से
गुंजित हर शाख हर डाल कर
पल्लव पर पानी की बूँदें
कुछ यूँ ठहर सी गई
जैसे पल्लव पर मोतियों की
एक लड़ी सी हो लग गई
नेहा शर्मा

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