बच्चे विदेश में सेटल हो गए थे.... दोनों बेटे मम्मी पापा को छोड़कर विदेश जाना नहीं चाहते थे.... विनय और विवेक की माँ.. गायत्री जो कि खुद एक प्राध्यापिका थी.. जाने के लिए दोनों को मनाती हैं ... इतना अच्छा अवसर कोई छोड़ता है भला... Scholarship भी और साथ में नौकरी की गारंटी भी.. रिसर्च के लिए भेजा गया था दोनों को.. दोनों जुड़वां थे और अभिरुचि भी एक जैसी...भौतिकी ... एक साथ ही दोनों का चयन रिसर्च के लिए हुआ था .. गायत्री और दिवाकर के लिए फक्र की बात थी...
उन दोनों के बच्चों के जाने से पहले अपने घर पर छोटी सी मिलन समारोह पार्टी रखी ... जिससे बच्चे अपने सारे रिश्तेदारों.. दोस्तों से मिलकर और उनका आशिर्वाद लेकर जाए...
समय पर रिसर्च कम्प्लीट हो गया और वही दोनों की नौकरी भी हो गई... गायत्री उनके विवाह के लिए परेशान थी.. सही समय पर सब काम हो जाए.. जब भी बात होती दोनों टाल देते.... इस बार जैसे ही दोनों ने इंडिया आने की बात की ...गायत्री ने लड़की देखी.. पसंद किया .. और विवाह भी संपन्न कर दिया .. नियत समय पर दोनों अपनी जीवनसंगिनी संग चले गए.. उनकी इच्छा थी.. मम्मी पापा भी साथ चले.. दिवाकर रिटायर्ड थे और गायत्री के अभी दो साल बचे थे.. नौकरी छोड़ने का प्रस्ताव उन्हें बिल्कुल स्वीकार नहीं था.. रिटायर्मेंट के बाद "देखते हैं" पर बात रह गई...
दो साल कैसे गुजर गए.. पता ही नहीं चला... बच्चे भी दो साल से नहीं आ सके थे... इतने बड़े घर में दो प्राणी... दिवाकर तो फिर भी इधर उधर में व्यस्त हो जाते.... गायत्री के लिए दिन पहाड़ों सा बीतता था...
बोझिल सी ज़िंदगी लगने लगी थी.. जैसे बिना किसी लक्ष्य के घसीट रही हो.. एक दिन दोनों कहीं से लौट रहे थे कि वही पास के एक झुग्गी के बच्चों को भीख माँगते और लड़ते देखा.. तभी उन्होंने विचार बना लिया कि अब उनका घर सूना नहीं रहेगा.. फिर से ज़िंदगी उनके घर आएगी और खिलखिलागी... उन्होंने दिवाकर के दोस्तों.. अपनी सहेलियों से बात की.. सब की स्थिति एक सी थी... समय काटना... सबने सहर्ष स्वीकृति दे दी...
अब था झुग्गी वालों को तैयार करना... ये थोड़ा मुश्किल था.. गायत्री जुनूनी महिला थी...गायत्री को पढ़ना और पढ़ाना हमेशा से पसंद था... साथ ही उन बच्चों के भविष्य की भी बात थी... खुद जाकर बच्चों के माता पिता से बात कर ऊँच नीच समझाया .. कुछ सुनते ही तैयार हो गए.. कुछ ने असमर्थता दिखाई... लेकिन जब गायत्री ने कहा कि दिनभर बच्चे उनके घर रहेंगे... पढ़ना और खाना पीना सब वही होगा... सुनकर और लोग भी मान गए ....हर कोई चाहता है कि उनके बच्चों उनसे अच्छी ज़िंदगी जिए... इसके लिए एकमात्र मार्ग शिक्षा से होकर ही जाता है...
अपने घर में ज़िंदगी को पढ़ते.. हँसते.. खिलखिलाते देखकर गायत्री मुग्ध हुए जा रही थी....
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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