पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष पे, जो विराजमान है
उससे क्यूं मानव, भला तू परेशान है।।
समझ न अपने को, इतना अधिक समर्थ।
इस धरा पे नहीं है, कुछ भी कहीं व्यर्थ।।
निर्जीव का है, जब यहां पे इतना मान।
तो इस सबल जीव को भी ,भला ही जान।।
न ये तुम्हारा शत्रु है, न ही कोई जीव खूंखार।
बस मानव! तू इन्हे भी दे, जीने का अधिकार।।
जंगल को जंगल ही रहने दे, न कर वहां हस्तक्षेप।
उनके आशियाने को उजाड़, न ले स्वयं पे आक्षेप।।
जीव सब अपने में, मगन व संतुष्ट हैं।
बस तू ही एक हृदय हीन व उनसे रूष्ट है।।
इस शक्तिशाली से, यदि तू डरता है ।
तो इन्हे मार क्यूं, शक्तिमान होने का दंभ भरता है।।
हे मानव! तेरी महत्वकांक्षा धरा का नाश कर दे।
इससे पहले तू अपनी लालच का विनाश कर दे।।
बाघ हमारी धरती का बलिष्ट और सुंदर जीव।
न धिक्कार और मार इसे तू , बना अपना हृदय निर्जीव।।
ये हमारी दुनिया के संतुलन के लिए जरूरी है।
बाघ जीवित हैं, तभी खाद्य श्रृंखला पूरी है।।
बाघ बचाओ जीवन बचाओ, ये नारा लगाना है।
रक्षा कर सभी जीवों का,
धरा को सुंदर बनाना है।।
"अंतररष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस पे विशेष"🐯
स्वरचित व मौलिक
कीर्ति रश्मि"नन्द
वाराणसी

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