सपनों के तानों बानों के संग रखा जो कदम ससुराल की दहलीज पर,
लिखने चली थी इक कहानी मैं प्रेम के रंगों में रंगकर।
प्रेम की चूड़ी जो खनकी हाथ में मेंहदी रची,
त्याग और विश्वास से मांग मैंने अपनी भरी।
सात फेरे, सात वचन,सात जन्मों के बंधन में बंध गयी,
छोड़ कर बावुल की गलियां मैं तुम्हारी हो गयी।
दिल की तख्ती पर हर दिन इश्क के वरक सजाती थी,
पाकर तुम्हारा अनन्य प्रेम मैं कहानी लिखती जाती थी।
पर अचानक एक दिन ऐसा तूफां आया था,
बह गया वो आशियाँ जो मैंने कभी सजाया था।
लाये थे अपनी अर्धांगिनी बनाकर तो छोड़ कर क्यों चले गए,
वादा किया था उम्र भर साथ निभाने का वो वादा क्यों तोड़ गए।
मेरे बहते अश्रुओं से तुम्हारे प्रेम की स्याही बह गयी,
शून्य सी जड़वत हुई मैं और कहानी अधूरी रह गयी।
शीला द्विवेदी "अक्षरा"

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