बाघ  हमारे देश का  राष्ट्रीय पशु है । इसका वैज्ञानिक नाम पैंथेरा टाइग्रिस है । इनके शरीर पर विभिन्न रंगों से समाहित रंग होते हैं  जैसे कि  काली धारियों के साथ  नारंगी, सफेद, और नीला रंग इनके शरीर के हिस्सों पर पाया जाता है । यह रंग ऊपरी तौर पर भिन्न-भिन्न होते हैं  परन्तु   सभी बाघों के नीचे का पेट वाला भाग  एक ही तरह का यानी  सफेद रंग का होता है। इनके  चार दाँत ,  दो ऊपर के जबड़े में और  दो नीचे के जबड़े में  बहुत ही नुकीले और धारदार  होते हैं । कहते है ना कि ईश्वर हर प्राणी के पालन-पोषण की व्यवस्था पहले से ही करके भेजते हैं और  ईश्वर ने बाघ को  मांसाहारी पशुओं की श्रेणी में बनाया है जिसे अपने  भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपने इन्हीं नुकीले और धारदार दाॅंतो की जरूरत पड़ती है । इन्हीं दाॅंतो से वह अपने  शिकार को आसानी से पकड़ती भी हैं । बाघ की लम्बाई लगभग  ८-१० फीट  और ऊँचाई ३-४ फीट होती  है । यह एक  जंगली जानवर है जिसे  भारतीय सरकार के द्वारा राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है।  यह बहुत ही शांत ,  ताकतवर और चालाक  पशु है  जो लम्बी दूरी तक छलांग लगाकर  अपने शिकार को पकड़ लेता है।  गाय, हिरन, बकरी, खरगोश और कभी-कभी तों यह  मनुष्यों को भी अपना शिकार बनाता हैं । वैसे तो नर बाघ जन्म के ४-५  साल बाद परिपक्व होते हैं जबकि मादा ( बाघिन )  ३-४  साल की आयु में परिपक्व हो जाती हैं। बाघिन की   गर्भावस्था  की अवधि ९५- ११२  दिनों  की होती है और यह  एक बार में 1-5 बच्चों को जन्म दे सकती हैं । जैसे ही बाघ बड़ा होकर  युवावस्था में पहुॅंचता है यह  अपनी माॅं  के क्षेत्र को छोड़ देता हैं लेकिन  बाघिन ऐसा नहीं करती वह अपनी माॅं के  करीब क्षेत्र में ही रहती हैं । एक बाघ की दहाड़ को लगभग  3 कि. मी.  दूर तक सुना जा सकता है । इसकी सबसे बड़ी उप-प्रजाति साइबेरियन बाघ है। 


 वैसे तो सनातन काल से ही हमारे सभी पशु - पक्षियों को विशेष महत्व दिया जाता रहा है और आज भी हमारे देश में बाघ को राष्ट्रीय पशु के रूप में  एक पहचान तों मिली ही है साथ ही  रॉयल बंगाल बाघ को भारतीय मुद्रा नोटों के साथ-साथ डाक टिकटों में भी चित्रित किया गया है।

लंबे समय से बाघों का शिकार शक्ति प्रदर्शन के लिए  किया जाता रहा है और यहाॅं तक कि इनके  शरीर के प्रत्येक हिस्से की तस्करी भी की जाती हैं ।  बाज़ारों  में चोरी - छुपे ही सही लेकिन इनके अंगों और खाल का  अच्छा मूल्य प्राप्त होता है। यही कारण रहा है कि  व्यक्तिगत और पूॅंजीगत  कारणों से बड़े पैमाने पर बाघों का शिकार होता आ रहा है जिनके कारण इनकी संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है ।  इसके साथ ही इनके विलुप्त होने का एक और कारण है , वह है :-  हम मानवों की जनसंख्या वृद्धि, औद्योगिक विकास और अनियंत्रित शहरीकरण । इन तमाम वजहों के कारण भी वन्य जीवों के प्रवास क्षेत्र का लगातार ह्रास हो रहा है‌ ।

 लेकिन सरकार ने इस ओर कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिसके कारण इनकी संख्या में वृद्धि हो रही है । वर्ष १९७०  में केंद्र सरकार की तरफ से बाघों के संरक्षण के प्रति एक मज़बूत राजनीतिक प्रतिबद्धता देखने को मिली और सरकार द्वारा वन्य जीव संरक्षण अधिनियम की शुरुआत करने का फैसला लिया गया  जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों में राष्ट्रीय उद्यानों और टाइगर रिज़र्वों की स्थापना की गई। इनके माध्यम से वन्य जीवों के संरक्षण हेतु विशेष प्रावधान किये गए जो देश के सामान्य वनों में उपलब्ध नहीं थे। इसी क्रम में  केन्द्र सरकार द्वारा प्रायोजित एक ऐसी ही परियोजना का शुभारंभ किया गया   :- " बाघ बचाओ परियोजना " । इस परियोजना की  शुरुआत ७ अप्रैल १९७३  को हुई थी। इसके अन्तर्गत शुरू  में ९ बाघ अभयारण्य बनाए गए थे जिसकी संख्या बढ़कर आज ५०  हो गई है ।

 सरकारी आंकड़ों की बात करें तो  २००६ में १४११ बाघ बचे हुए है ,  २०१० में  इनकी  संख्या बढ़कर १७०१ हो गयी थी ,  २०१४ में २२२६  और २०१८  में  बाघों की संख्या  बढ़कर २९६७  हों गई है । हमारे भारत देश  के  एक  शहर  नागपुर को  " भारत की टाइगर कैपिटल " भी कहा जाता है  क्योंकि यह भारत में कई टाइगर रिज़र्व को दुनिया से जोड़ता है । हम आशा करते हैं कि आगे भी केंद्र सरकार द्वारा ऐसे ही ठोस कदम उठाए जाएंगे जिससे की हमारे देश में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी होती रही । 

                                          
    धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻

" गुॅंजन कमल " 💓💞💗