शिवांश जब दो साल का हुआ तो स्वाति ने एक स्कूल में टीचर की जॉब कर ली । तीन साल हो गए उस घटना को पर स्वाति अपने अतीत को भूला नहीं पाई । उसने हंसना - रोना सब भूला दिया यहां तक उसने की रंगों से भी परहेज कर लिया ।  अब उसके जीवन में सिर्फ एक ही रंग रह गया था । श्वेत रंग ... स्वाति के मां - पिताजी उसे देखते और यही सोचते की काश कोई आये और स्वाति की बेरंग जिंदगी में रंग भर दे । " कहते हैं ना ईश्वर के घर देर है पर अंधेर नहीं " 
सोमवार की सुबह स्वाति की मौसी का फोन आया ।जब उन्होंने स्वाति के बारे में पूछा तो , स्वाति की मां ने रोते हुए कहा - छोटी , मेरी बेटी को ना जाने किसकी नज़र लग गई । तीन साल हो गए उस घटना को लेकिन ऐसा लगता है कि वो अब भी उस बुरे दौर को भूला नहीं पाई है । ये कहकर स्वाति की मां चुप हो गई । " अभी कहां है स्वाति " मौसी जी ने पूछा ! 
" अपने कमरें में है , अभी बुलाती हूं उसे  " स्वाति की मां ने कहा । 
स्वाति की मां , स्वाति को आवाज देकर बुलाती है । स्वाति - हैलो मौसी ! 
मौसी जी - कैसी है गुड़िया ? 
स्वाति - मैं ठीक हूं मौसी जी , आप कैसी हैं ! 
मौसी जी ने स्वाति के आवाज़ से पहचान लिया की , बच्ची अभी भी अपने अंदर दर्द समेटे हुए हैं । 
मौसी जी ने फिर कहना शुरू किया । गुड़िया एक खुशखबरी बताने के लिए फोन किया है । जरा फोन स्पीकर में तो डाल सबको एक साथ बताऊंगी । फोन स्पीकर में कर दिया है मौसी जी अब आप बताओ । 
मौसी जी - तो सुन गुड़िया , अपनी छुटकी की शादी तय हो गई है । लड़के वाले बहुत अच्छे हैं । लड़का डाक्टर है । सब घर वाले मौसी जी की बात सुन रहे थे । उनकी आवाज़ से ही लग रहा था कि वो कितनी खुश हैं । आप सब को आना है शादी में खास कर तुझे गुड़िया । कोई ना भी आये तो चलेगा लेकिन तुझे और शिवांश को आना ही है । शादी में वरना मैं तुझसे कभी बात नहीं करूंगी । 
लेकिन मौसी आप जानती है कि मैं कहीं नहीं जाती । स्वाति ने कहा ! 
मैं कुछ नहीं सुनूंगी तुझे शादी में आना है मतलब आना है । समझी ! वरना अपनी मौसी को हमेशा के लिए भूल जाना । अब अपनी मां को फोन दे ।  
स्वाति अपनी मां को फोन देकर वहां से चली जाती है । स्वाति के चले जाने पर स्वाति की मां अपनी बहन से बातें करती रही और कुछ तय करके उन्होंने फोन रख दिया । अब स्वाति के घर में शादी की खरीदारियां होने लगी । 
सब खरीदारी कर अपने अपने सामान की पैकिंग करने लगे । लेकिन जब स्वाति ने शिवांश के कपड़े पैक करने लगी । तो अंजलि जी ने ये कहकर मना कर दिया कि शिवांश के कपड़े वो खुद पैक करेंगी अपने बैग में । ये कहकर वो शिवांश के कपड़े लेकर  वहां से चली जाती है ।  
अगले दिन तय समय पर सब रायपुर के रेलवे स्टेशन पर सभी पहुंच गए थे । स्वाति की मौसी , उनके घर वाले और खुद दुल्हन भी क्योंकि शादी अपने शहर में ना करके जगन्नाथ पुरी के किसी भव्य होटल में करने वाले थे ।तय समय पर ट्रेन आई स्वाति और उसके घरवाले और मौसी के घर वाले सभी एक साथ ट्रेन में बैठ गए । ट्रेन अपने समय पर अपने गंतव्य की ओर बढ़ने लगी । पूरे एक दिन के सफर के बाद सभी घरवाले पुरी पहुंच गए और टैक्सी कर सभी होटल में पहुंच गए । होटल पहुंच कर सभी अपना - अपना सामान लेकर बताये गये । कमरों में गये । होटल बहुत ही भव्य था । जिसमें दो मंजिला इमारत बनी हुई थी ।ऊपर के कमरों में लड़के वालों के ठहरने की व्यवस्था की गई थी और नीचे लड़की वालों की । होटल के बाहर बहुत ही बड़ा गार्डन बना हुआ था । जिसमें तरह - तरह के फूल और पौधे थे । सभी लोग अंदर आ गये । बस स्वाति को छोड़कर । वो धीरे धीरे सब तरफ देखते हुए अपने हाथ में अपना कपड़े का बैग लिए आ रही थी । तभी मासी जी ने एक वेटर की ओर इशारा किया और स्वाति की तरफ उंगली दिखाई । वेटर इशारा समझ कर अपने साथ एक गंज में कुछ लिए स्वाति की ओर बढ़ने लगा । जैसे ही स्वाति उसके पास आई उसने जानबूझ कर अपने हाथ में पकड़े गंज को स्वाति के ऊपर उड़ेल दिया ....

क्रमशः 
रचनाकार - श्वेता सोनी