नैतिकता जंजीर पडी हो मर्यादा अभिशाप कहां।
मर्यादा के कारण ही हम करते हैं सत्कर्म जहां।।
नैतिक मर्यादाओं से ही समाज का उत्थान हुआ।
नैतिक मर्यादावादी को हर जगह सम्मान मिला।।
जब तक नैतिकता की बेड़ियां मर्यादा में पड़ी रहीं।
तब तक मर्यादा इस धरा पर धर्म, सच में खड़ी रही।।
मर्यादा अभिशाप बनेगी होगा तब सम्मान कहां।
मर्यादा के कारण ही हम करते हैं सत्कर्म जहां।।
मर्यादा की लीक पड़ी तब परंपरा का उदय हुआ।
इस धरा पर मर्यादा में अभिशापों का जन्म हुआ।।
मर्यादा दूषित होती तब यह अभिशाप कहातीं।
सारे गलत कर्मों को तब मर्यादा चादर उढाती।।
मर्यादायें अच्छी हैं जब तक मानवता होगी वहां।
मर्यादाओं के कारण ही करते हम सत्कर्म जाहां।।
नाम - विक्रांत राजपूत चम्बली
पता - ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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