एक माली की भरी बगिया में एक नन्ही फूल बन आई थी,
चहकती चिड़िया सी कभी इस कभी उस डाल पर इठलाई थी, हां मैं बेटी हूं अपना फर्ज निभाने आई हूं!!
बचपन बिता आई जवानी खेल खिलौने से अब दूर हुई, मां के जैसे ही अब मैं भी चूल्हे पर रोटी सेंकने को मजबूर हुई!!
संस्कार सिखाए सबने मगर सहनशीलता की परिभाषा कोई समझा नही पाया, क्या होता है दर्द एक बेटी का उफ ये कोरा समाज कभी समझ नहीं पाया!!
लोहे सी टपके आग से सोना बन जब निकली ख्वाब बहुत थे आंखों में,मगर हाथों में किताबों की जगह किसी गैर की नाम की मेहंदी रचा दी गई, हां मैं बेटी हूं अपना फर्ज निभाने आई हूं!!
बाप की पगड़ी के मान की दुहाई देकर ना जाने कितनो ने ही दफ़न किए जज़्बात मेरे, मैं रोई भी ,गिड़गिडा़ई भी , मांगा हर दर पर जाके सहारा मगर किसीने ना थामे हाथ मेरे, हां मैं बेटी हूं देखो बस फर्ज निभाने ही तो आई हूं!!
बेटी हो तुम सब कहते हैं ,जला दो अरमान सब दिल के अपने,पराई हो तुम घर कहां तुम्हारा यहां फिर किसे कहती हो तुम अपने,बस बेटी हो फर्ज निभाते जाओ ,उफ तक ना निकले जुबां से ये कर्ज चुकाते जाओ!!
हां मैं बेटी हूं अपना फर्ज निभाने आई हूं ,ना अरमान मेरे कोई, ना अभिमान रखें है दिल में लाख बलाएं लुटा कर देख मैं अपना फर्ज निभाने आई हूं!!

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