मन रे तू कैसे धीर धरे
हलचल से भरा झील सा मन
उथल पुथल में बंधा
हमेशा उलझा उलझा सा रहने वाला  
आसां नहीं इस मन को समझना 
कभी टूटता कभी उभरता 
प्रभु का ध्यान करता
पूजा की थाल सजाता
मन ढूंढता सुलझे धागों की डोर
हिचकोले खाती नाव 
जो होती मंझधार में 
डगमगाते कदमों को सम्भालती
पूजा की एक छोटी सी तरंग 
घंटी की सुरीली धुन होती 
दिए में घी की बाती 
वायु प्रकंपित बाती की लौ
संघर्ष से सफ़लता का संदेश देता 
कपूर-लोबान से सुगंधित होता प्रभामंडल
अर्पण करना पुष्प का चरणों में प्रभु के 
आरज़ू हो जैसे अंतर्मन की
अधरों से गूँजित मंत्र 
प्रेम का उजाला दिखा 
आलोकित करता जाए मन को 
धागे सुलझते जाए जीवन के 
पावन सा हृदय लिए 
दुआ बन समा गया जैसे 
पूजा की थाल में
    
आरती झा(स्वरचित व मौलिक) (प्रकाशित) 
दिल्ली 
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