मानव जीवन में चार आश्रम होते हैं मगर वृद्धा अवस्था सबसे दुःखद हैं ये तो सबके साथ होना है आज या,कल मगर बिपुल के पिता कन्हैया लाल जी की स्थति बहुत ही दयनीय थी। कन्हौयालाल पास के गांव में स्कुल के प्रिनंसीपल के पद पर आसीन थे‌। जबतक नौकरी थी,तबतक उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों के लिए बहुत प्रयास किया उनके दो बेटे और दो बेटियां थीं कन्हैयालाल और उनकी पत्नी जीवनभर अपने बच्चों के देखरेख में कोई कमी नहीं की बच्चों के पढ़ाई-लिखाई, पालन-पोषण में भी कभी कमी नहीं की, दोनों लङके अच्छे पद पर आसीन थे‌। बेटीयों की शादी भी कर दी थी । धीरे-धीरे समय बीतता गया उन्हें पता ही नहीं चला दोनों लङके अपना- अपना परिवार लेकर बाहर रहने लगे। सिर्फ एक पति-पत्नी गांव में रहते थे, रिटायरमेंट के बाद वो दोनों अपने बच्चों के साथ रहने लगे। धीरे-धीरे समय बीतता गया और कुछ वर्षों के बाद कन्हैयालाल की पत्नी की मृत्यु हो गई गई। और वह बिल्कुल भी अकेले हो गये। बच्चे भी अपने-अपने काम में लग गए मगर पिता की हालत का किसी को पता नहीं चला। धीरे-धीरे उनका शरीर थकने लगा, वह बहुत वृद्ध हो चुके थे। घर के एक कमरे में खाट पर लेटे रहते थे, उनके बेटों ने सोचा कि पिता जी को वृद्धा आश्रम में छोङ देते है। वहां उनकी देखभाल भी हो जाएगी। ये सुन कर कन्हैयालाल मौन हो गये। और धीरे से अपने कमरे में टुटी हुईं खाट पर लेट गये। उन्होंने  सोचा की जिन बच्चों के लिए हमने अपना पुरा जीवन दे दिया आज वही बच्चे हमें वृद्धा आश्रम छोड़ने की सोच रहे हैं वह धीरे से उठने की कोशिश की मगर वह बिस्तर से उठ नहीं पा रहे थे।उनका पूरा शरीर कमजोर हो गया था। वह आखों में नमी लिए देख रहे थे। दुसरे दिन बच्चों ने उन्हें ले जाने की तैयारी में लगे थे। मगर कन्हैयालाल को थोङा होश आया तो वह धीरे से उठने और अपने गांव आ गये। यहां आकर उन्हें अपने गांव के लोगों के साथ अपनेपन का अहसास हुआ और वह गांव में रहने लगे। वहां के लोगों ने उनकी देखभाल की। फिर वह कभी अपने बच्चों के पास नहीं गए।

कभी- कभी अपनेपन का। अहसास ही निर्जीव मन में जीने का होंसला बढा देता है।

अर्चना पांडेय,, आर्ची