जैसे ही मै अवि को गोद मे लेकर जाने के लिए निकलती हूँ । मेरे प्यारे देवर जी जो कभी भाभी ..भाभी कहकर मेरे आगे पीछे घूमते थे।वो मुझसे अवि को  छिनने लग जाते है। उन लोगो को लगता है कि अगर मै अवि को लेकर घर से कही  गई , तो मै कही  वापस ही न आऊँ। मै नहीं मानी तो उनकी हिम्मत इतनी बढ गई कि उन्होंने मुझपर हाथ उठा दिया। मै अवाक्  रह गई। सही कहते है दुनिया वाले जिसके पति की कोई इज्ज़त नहीं होती है  उसकी पत्नी की इज्जत धूमिल कर दी जाती है। उस वक्त तो ऐसा लगा कि मुझे मर जाना चाहिए। मै भी कितनी निर्लज्ज हूँ इतनी बेइज्जती होने के बाद भी मै इन लोगो के साथ रह रही हूँ। इस आदमी की वजह से मेरी इज्ज़त दो कौड़ी की हो गई है। 


देव - "जब आपके देवर ने आप पर हाथ उठाया था तो आपकी सासु माँ क्या कर रही थी उन्होंने रोका नहीं।"


वो क्या रोकती देव जी उन्हें तो तमाशा करना और देखना दोनो का ही बहुत श़ौक है। जब मेरे देवर ने मुझपर हाथ उठाया था तभी मैनै एक नजर उठा कर मम्मी जी की तरफ देखा उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नही दिखाई। मै अवि को उनके  गोद से छीन कर के , लेते हुए उनसे पूछा कि आप किस हक से अवि पर अपना हक जमा रहे हैं।

जब इसका दूध का डब्बा खत्म हो जाता था ,तब तो इसके दूध के लिए, आप मे से  किसी के पास पैसे नहीं रहते है। तब मुझे नौकरी करने के लिए मजबूर किया गया। जब मेरा बेटा बीमार होता है तब आप लोगों के पास दवाई के पैसे नहीं रहते है। किस हक से कह रहे हैं कि यह मेरे.संग कही नहीं जा सकता है??आपको कोई हक नहीं है , मेरे साथ ऐसा व्यवहार करने का, समझे आप!!!  अगर मैं इस घर में लौटकर आई हूंँ ,तो अपनी मर्जी से लौटी हूँ। किसी के दबाव मे नहीं , तो किसी भ्रम मे मत रहिएगा। हमेशा याद रखिऐगा कानूनन इस घर पर मेरा भी हक है। आइंदा आगे से कभी भी ऐसे गलती करने का सोचिएगा भी मत , आपको यह मेरी चेतावनी है। वरना मै भी भूल जाऊँगी आपका और मेरा रिश्ता क्या है।
यह कहकर मै अवि को लेकर अपने कमरे मे चली गई। ना जाने कौन सी दिव्य शक्ति मेरे अंदर जाग गई। जो मै इतनी बाते अपने देवर को सुनाकर आ गई। शायद जब माँ के ऊपर अपने बच्चे की बात आती है तो उसमे अपने ही शक्ति जाग जाती है।  जिंदगी मे बहुत सारी ऐसी बाते होती रहती है। जो कहा भी ना जाए, सहा भी ना जाए मगर उसी के साथ जीना भी पड़ता है।

प्रिति देव से बोलती है , मै फोन रखती हूँ , काफी थक गई हूँ ।मै सोना चाहती हूँ। तुम भी आराम कर लो।
देव ने कहा "हाँ ठीक है आप आराम करिए।"

प्रिति दूसरे दिन अपने मायके से वापस ससुराल आ जाती है। पंद्रह दिन बाद अपने बेटे अवि से मिलकर उस पर अपनी ममता न्यौच्छावर करती है। जाड़े की छुट्टी के बाद स्कूल भी खुल जाता है। 

प्रिति की वही पहले वाली जिंदगी की गाड़ी पटरी पे आ जाती है।
शालिनी से भी बीच बीच मे फोन पर बाते हो जाती थी। उसकी  डिलीवरी मे टाईम था इसलिए वो स्कूल से छुट्टी लेकर रेस्ट कर रही थी।

अब अधिकतम समय मेरा और देव का साथ मे बीतता था। हम साथ मे ही लंच करते ,जब भी हम दोनो साथ मे रहते.त़ो हमारे स्कूल कलीग्स हम दोनो क़ो एकसाथ देखते तो यही कहते है हम साथ मे कितने अच्छे लगते है ,बिल्कुल परफेक्ट कपल की तरह। हम दोनो को सुनकर हँसी आ जाती थी।

लेकिन मैनै महसूस किया कि देव के दिल मे मेरे लिए दया करते करते प्यार का अहसास जगने लगा था। उसकी आँखो मे नजर आता था। उसका प्यार एकदम पवित्र था। वो मुझसे हमेशा एक दूरी रखकर ही बात किया करता था। देखा जाए तो हम इतने सालो से एकसाथ एक ही पटल मे काम कर रहे थे। पर उसने मुझे कभी छुआ भी नहीं था। बहुत इज्ज़त के साथ पेश आता था । देव ने तो मुझे अपनी पत्नी वीणा जी से भी मिलवाया था। बहुत सीधी सरल स्त्री थी और उन्हें भी मेरे बारे मे सबकुछ देव ने बता दिया था। 
अब जब भी मै या वीणा जी कुछ भी खरीदते एक दूसरे के लिए जरुर खरीदते। 
हम दोनो मे बहनो सा प्यार हो गया था।
याद है मुझे उस दिन वट सावित्री की पूजा थी।, और स्कूल मे उस दिन पैरेंट्स टीचर मीटिंग भी , मै लाल साड़ी पहनकर स्कूल गई थी। पहली बार देव ने और स्कूल स्टाफ ने मेरी तारीफ की।  मै तो भूल गई थी, की तारीफ किसे कहते है क्योंकि प्रेम जी तो मेरी तारीफ करना कब का ही भूल गए थे। 
उल्टा मेरे कमाए हुए पैसो की चोरी करना ये तो इनको बखूबी आता था। किसी भी पत्नी के लिए बड़ी विडम्बना की बात थी, कि अपने ही पति से सैलरी को छुपाकर रखना होता था। अलमारी के लाँक करती तो लाँक तोड़ देते थे। 

मेरी जिंदगी स्कूल से घर ,घर से स्कूल तक सीमित रह गई थी।
स्कूल ज्वाईन करने के बाद मैने जिंदगी का हर लम्हा जिया। एक दूसरो की खुशी मे शरीक होना जन्मदिन पर पैसे इकट्ठे करके एक दूसरो के लिए गिफ्ट खरीदना , बधाईयाँ देना स्कूल स्टाफ का एकसाथ खाना ,वो हँसी मजाक करना बहुत याद आते है।   तुम्हारे और शालिनी के साथ रहकर ही तो मेरे अंदर एक नया जोश और आत्म विश्वास का संचार हुआ।
तुम तो हमेशा मेरे दुख तकलीफ का कारण पूछते रहते थे, मगर शालिनी मुझे बिना कहे ही समझ जाती थी। जब मै दर्द मे रहती थी तब वो मेरे हाथ पर हाथ रखकर हौले से गले लगा लेती थी। बिना कुछ बताए उससे गले लगकर बेलगाम आँखो से आँसू बहने देती थी।
एक स्त्री ही एक स्त्री के मन को बखूबी पढ़ सकती है।
एक सच्चा दोस्त अपने दोस्त के चेहरे को पढ़ सकता है।
मै तँग आ गई थी प्रेम जी का रोजाना रात को गाँजा पीकर आना ,मेरी इजाजत के बगैर हर रात मनमानी करना।
रोज रात को दो बजे सोना सुबह चार बजे उठना और भाग भाग कर घर का सारा काम करना। मम्मी जी को बोलती प्रेम जी को समझाने कि मै भी एक इंसान हूँ खिलौना नहीं। लेकिन मम्मी जी उल्टा  मुझे ही चुप करा देती, कहती हर पत्नी का फर्ज होता है अपनी पति को खुश रखना। तो क्या पति को बिना 
शारीरीक भोग भोगे औरते अपने पति को खुश नहीं रख सकती है क्या???
मेरे सवाल का जवाब देने वाला कोई नहीं था। 

कुछ दिनो से स्कूल मे वर्कलोड ज्यादा ही हो गया बच्चों के फाईनल परीक्षा करीब आ रहे थे। आँफिस मे 
न्यू एडमिशन के लिए पैरेंट्स की भीड़ थी। घर आते आते चार बज जाते  थे।
इधर  अवि की भी मौखिक परीक्षा शुरु हो गई थी। इसलिए रोज  कि अपेक्षा उसे भी ज्यादा समय देना होता था। नखरे उठाना, खाना खाते वक्त कहानी सुनाना , उसके साथ खेलना ,सुलाना ये तो हमारे छोटे नवाब के दिनचर्या थे। 

उस रात प्रेम जी दस ही बजे घर आ गए थे ।मैनै उनको  और घरवालों को गरमा गर्म खाना देकर ,,किचन समेटकर काफी थक के चूर होकर अपने कमरे मे पहुँची ही थी कि रोजाना की तरह देव का मैसेज आया, उससे थोड़ी देर बात की ही थी, कि प्रेम जी के कदमो की आहट सुनकर मैनै देव को मैसेज किया कि मै तुमसे कल बात करती हूँ और फोन बँद करके रख दिया।

प्रेम जी रोजाना खाना खाने के बाद एक घंटा अपनी माँ और  भाई से बात करते है। फिर अपने पीने के कार्यक्रम मे लग जाते।

उस रात प्रेम जी बहकते कदमो से हाथो मे शराब की शीशी लेकर कमरे मे दाखिल हुए। मैनै उन्हें देखा पर  मै चुपचाप आँख बँद करके सो गई । मेरे करीब आकर मुझसे छेडख़ानी करने लगे। मुझे जबरदस्ती शराब पिलाने लगे। मैनै बहुत आनाकानी की और कहा मै बहुत थकी हुई। मै आपका साथ देने मे असमर्थ हूँ। पर उन्होंने  जबरदस्ती शराब मेरे गले मे घोंट दी।

मुझे भी बहुत गुस्सा आया मैनै हाथ से शीशी ली और जमीन मे उठाकर फेंक दी। शराब की शीशी टूटकर चकनाचूर हो गई। ये देखकर वो गुस्से मे तिलमिलाकर मेरे बालो को पकड़कर मुझे उठाते हुए दाँत पीसकर  कहने लगे " साली तेरी इतनी हिम्मत तू मुझे मना करती है। पति हूँ मै तेरा , चार पैसे क्या कमाने लग गई , मुझे आँखे दिखाती है। आज तेरा वो हश्र करुंँगा कि भूल जाएगी अपनी सारी हेकड़ी। मेरा हक है तुझपर , तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।" बोलकर अपनी पैंट की बेल्ट उतारकर ताबड़तोड़ मेरे शरीर पर बारिश करने लग जाते है। मैने अपने बचाव मे बेल्ट का एक छोर पकड़ा भी मगर वो मेरे हाथो से छूट गया। वो मुझे तब तक मारते रहते है जब तक वो खुद बेहोश होकर लुढक नहीं गए।
मेरा पूरा शरीर मार से लाल पड़ गया था। होठो से खून  बहने लगा था ,चेहरा सूज गया था ,हिम्मत ही नहीं बची थी मुझमे मै उठकर एक पेन किलर निकालकर खा लू। 
आज मुझे मेरी किस्मत पर तरस आ रहा था। मैनै कभी भी भगवान से शिकायत नहीं की थी मगर आज करने को जी चाह रहा था। समझ मे नही आता जब भाग्य विधाता मेरी किस्मत लिख रहे थे तब उनके कलम की स्याही खत्म हो गई थी क्या?? या बची खुची स्याही से जैसे तैसे मेरी किस्मत लिख डाले। 

आज मै खुद के विचारों मे डूबी हुई थी। जैसे तैसे रात से सुबह होती है। मै देव को मैसेज करती हूँ मै कुछ दिन स्कूल नहीं आ पाऊँगी। उसने मुझसे बहुत पूछा लेकिन मैनै उसे नहीं बताया और उससे कहा जब तक मै उससे ना कहुँ तब तक वो मुझे ना तो फोन करे ना ही मैसेज।
मै हिम्मत बटोर कर उठकर दवाओं का डब्बा  निकालकर पेन किलर निकाल कर खाती हूंँ। तब तक मे मेरी जन्म देने वाली स्नेहा माँ का विडियों काँल आ जाता है। मैं बार बार काटती हूंँ , वो बार-बार मुझे फोन करती रहती है  , थक हार कर मैं फोन उठाती हूंँ। फोन उठाते ही वो गुस्से मे मुझसे पूछती इतना देर से फोन कर रहे थे, काहे नहीं उठा रही थी कितने दिन हो गवा है तुमको देखे नहीं है ,बोलते बोलते ही मेरे चेहरे पर नजर पड़ते ही  स्नेहा माँ मुझसे पूछती है " क्या हुआ?? ये चोट कैसे लगा है तुमको ?? कही गिर उर गई थी क्या?? कैसे हुई तुम्हारी ये हालत , मै चुपचाप उनकी बाते सुन रही थी। अरे बोलो भी बिटिया क्या हुआ ?/हमरा कलेजवा धकधका रहा है।" स्नेहा माँ ने कहा
मैं सारी रात की बातें माँ को बताती हूंँ। माँ मेरी बाते सुनकर फोन पर ही रोने लग जाती है।तब तक मे वहांँ  मेरे जन्मदाता पिता जी भी आ जाते है। मेरी हालत देखकर कहते है "उस हरामजादे की इतनी हिम्मत मेरी बेटी पर हाथ उठाया , मैं अभी आता हूंँ तुझे लेने के लिए और अभी ,पुलिस कंम्पलेन करता हूँ । सारी जिंदगी पुलिस के डँडे खाएगा तो सारी मर्दानगी का नशा एकबार मे उतर जाएगा।

फोन रखने के बाद थोड़ी देर मे वही लेट जाती हो।
पड़े पड़े सोचती हूँ दो दिन स्नेहा माँ के पास चली जाऊँ। जब मेरी आँखे खुलती है तब मुझे मेरा शरीर हल्का महसूस होता है। शायद दवाई ने अपना असर दिखा दिया। मै उठकर अपने कपड़े ठीक करती हूँ। अलमारी से अपना पर्स निकालती हूँ। और धीरे धीरे सीढियों से नीचे उतर जाती हूँ। 


सीढी से उतरते ही सामने मेरी सासू मांँ मिल जाती है मेरा हाल देख करके मुझसे पूछती है ,क्या हुआ ??मैंने कहा आपके प्रिय सुपुत्र ने.ये हाल किया है। और मैं पुलिस स्टेशन  कंप्लेंन करने जा रही हूँ।
अरे पागल हो गई हो तुम क्या ?? पति पत्नी मे लड़ाई झगड़े होते रहते है इसका मतलब तुम घर की बात बाजार लेकर जाओगी। 
कौन सा पति कैसा पति ....अच्छा वो पति की बात कर रही जो पत्नी पर हक तो जमाना जानता है मगर 
फर्ज निभाना नहीं जानता। मेरे कमाए हुए पैसो को चरस गाँजा मे उड़ाना जानता है। जो पत्नी की इज्ज़त नहीं करते हो  ,अपनी पत्नी को भोग की वस्तु समझता हो कही आप उस पति की बात तो नहीं कर रही है........। 

हटिए मेरे रास्ते से .......

मम्मी जी अपने बेटे की करतूतों की तरफ से मेरे पैर पकड़ कर माफी मांँगने लग जाती है। बेटा ,बेटी की शादी की दुहाई माँगने लग जाती है।
रिश्तों को वास्ता देकर हाथ पाँव जोड़कर मुझे आखिर मे मना ही लेती है। इतने मे ही स्नेहा माँ और पिताजी आ जाते है। सभी बैठ कर चाय नाश्ता करते है। और घर की बात  घर मे ही रखना उचित समझते है। प्रेम जी को एक और मौका देते है।

मेरी सास एक महीना अपने पास सुलाकर मेरी देख रेख करती है। इस एक महीने के दौरान प्रेम जी पर नजर भी रखती है।

कुछ दिन आराम करने के बाद , मै जब स्कूल गई सभी ने मेरे चेहरे पर दाग देखकर मझसे पूछा ??/
तो मैने सबको एक छोटा सा रोड एक्सीडेंट बता दिया था । 
बच्चो के फाईनल परीक्षा चालू हो गई थी। लेकिन खत्म होने के पहले ही कोरोना ने हमारी जिंदगी मे कदम रख दिया था। मै वापस घर मे कैद हो गई थी।
स्कूल बँद हो गए थे। मेरी जिंदगी घर मे रहकर तहस्त नहस्त हो गई थी।  अब देव से भी बाते बँद हो गई  थी।
लेकिन शालिनी ने खुशखबरी देकर दिल खुश कर दिया था। उसने वीडियो काल करके अपने चाँद सी बेटी होने की खबर.सुनाई। जज्चा बच्चा दोनो ही स्वस्थ थे। देखकर तसल्ली हुई।

एक दिन मुझे बुखार हो गया था। और संजोग से उसी दिन देव का फोन आया। मेरी आवाज बहुत भारी सी लगी ,तब उसने मुझसे पूछा, मैने बता दिया सुनकर बहुत गुस्सा हुआ बोला "आप किस का इंतजार कर रही है  ,आपको पता है न आपके पति को आपकी परवाह नहीं है।  जाकर दिखाती काहे नहीं है डाक्टर को  और कहा की आने जाने मे कोई परेशानी होगी तो मुझे बता दिजिएगा मै आपको लेने आ जाऊँगा।" 
मै डाक्टर को दिखा कर घर वापस आने के लिए सड़क पर काफी देर तक खड़ी रही मगर कोई भी 
सवारी ही नहीं आई है। धूप मे खड़े खड़े मुझे चक्कर आने लगे । मैनै पहले मनु भैया को फोन लगाया मगर उनका फोन इंगैज आ रहा था। फिर मैनै देव को फोन लगाया देव ने कहा आप 10 मिनट रुकिये मैं आता हूंँ।  तब तक में भैया का फोन आ जाता है फिर मैं देव को फोन करके मना करती हूंँ और मैं भैया के संग घर आ जाती हूंँ। 

मेरी तबीयत अब दिन प्रति दिन बिगड़ती ही जा रही थी, डॉक्टर ने मुझे टाइफाइड बताया और टेस्ट करने को कहा लेकिन मै दवाई खरीदकर घर वापस आ जाती हूँ।  मेरे घर मे किसी को मेरी कोई परवाह नहीं थी। मै जैसे पहले घर के काम करती थी धीरे धीरे वैसे ही किया करती रहती थी। मेरा शरीर पूरा पीला पड़ने लग गया था। मेरी भूख भी बँद हो गई थी। मै काफी कमजोर हो गई थी।
स्नेहा माँ और मनु भैया का फोन आता रहता था तो मै सदा अपनी खैरियत ही बताती है।

अवि सारे दिन पूरे घर मे उछलता कूदता रहता था। अब वो बड़ा हो गया था तो वो भी अपनी आते जाते झलक ही दिखाकर जाया करता था। 

कोऊ ना समझे मेरे मन की पीर।
कासे कहूँ कहाँ जाऊँ धरू मै धीर।
सहिष्णुता की पार हो गई परिकाष्ठा
अब तो भगवान थाम लो साँसो की डोर।

अतीत के पन्ने फड़फड़ा रहे थे। आँखो से अविरल आँसू बह रहे थे। साँसो की डोर छूटने को थी। तभी मेरे दिल से अजीज दोस्तों का फोन आया। मुझे देखकर  शालिनी हुई अति व्याकुल ,"ये क्या हाल बना लिया अपना सखी??"  
ठीक ही तो हूँ ...कहकर मै भी रो पड़ी। कहने सुनने को बहुत कुछ था। पर हम एकदूसरे को देखते ही रहे ,तब तक मे देव का भी काँल आ जाता है। उसने कहा देखो "आज तुमने अपने दोस्तों को देख लिया न अब तुम जल्दी से ठीक हो जाओगी।"
उनकी ये बाते सुनकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। मैनै कहा इतनी सी ही तो बात थी , आज किया फोन पहले ही कर लेते तो शायद चांस भी था।

मेरी साँसे उखड़ने लगी। मेरे हाथ से फोन छूट जाता है। जैसे मेरी साँसे इन दोनो के लिए ही रूकी थी। आज मुझे मेरे सारे दर्द से मुक्ति मिल रही थी। मेरी चक्षु हौले हौले सदा के लिए बँद हो रही थी।

उसकी अंतिम विदाई मे देव वीणा और शालिनी भी आते है। और उसके पीले पड़े शांत शरीर को देखकर उसकी सारे दर्द को भाप लेते है। उसे नम आँखो से श्रद्धांजली देते है।

अब ना होगा आज से कल!
ना ही होगा पल दो पल!

सपनो में सदा से खोना!
अब किस बात का है रोना?
अब ना होगा आज से कल………………

टूटी है जो सांसे, रुक गई है ये धड़कन!
मिट्टी में मिला ये तन!
अंत हुआ जीवन!
गगन के लोक चला ये मन!
अब ना होगा आज से कल………………

क्या यही व्यथा होगा वहां?
हमने जो सहा है यहां!
किस कर्म का फल भोगा!
इतना तो कसक होगा!
अब ना होगा आज से कल………………

समाप्त (शिल्पा मोदी✍️✍️)