एक वो भी जमाना था खेलते थे कूदते थे मस्ती में झूम कर पढ़ने और लिखने का बोझ नहीं सर पर
जो मिला खा लिया नींद आई सो गए हर घर अपना घर था और घर वाले अपने मां बाप
गलती होने पर डांटता था पूरा मोहल्ला और अच्छे काम करने पर मिलते थे ढेर सारे तोहफे
तितली परिंदे चिड़ियों के पीछे दौड़ना थमन पसंदीदा काम जुगनू को डिब्बों में भरकर रखते थे चारे की टोकरी बनाकर उसमें भरते थे तिलचट्टे
कोई फिक्र नहीं थी एक साथ उड़ाते थे जुगनू तिलचट्टे हरे हरे पूरी बगिया हरी हो जाती थी
और डांट पड़ती थी घर में जब तुम जुगनू बनोगे यह जुगनू तुमसे बदला लेंगे जब तुम तिलचट्टे बनोगे यह तिलचट्टे तुमसे बदला लेंगे
रात भर प्रार्थना करती थी उन जुगनू से उन पंछियों से हमें माफ कर देना
अब दोबारा ऐसा नहीं करेंगे ऐसा था वो जमाना झूमता गाता बेफिक्र मस्ती में
बचपन चला गया रह गई यादें और आज इस कविता के माध्यम से वह बचपन दोबारा जी लिया

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