राम नाम की महिमा गा ले,
राम नाम तू कंठ समा ले,
जीवन की सुध ले ना ले,
राम प्रभु को अपना ले,
साधक जपते राम ही राम ,
रे, मन तू क्यों नहीं लेता उनका नाम!
रचा स्वयं जिसने संसार,
आदि अंनत के पालनहार
मर्यादा का पाठ पढ़ाने,
उसने भी कष्ट सहा अपार,
त्यागमूर्ति सीताराम,
रे, मन तू क्यों नहीं लेता उनका नाम!
अहिल्या को तारा जिसने,
झूठे बेर शबरी के खाए,
केवट को मित्र मान लिया,
राम को तो बस प्रेम भाए,
जनकनंदनी,नेह प्रीति
,स्वयं विराजे जिनके वाम,
रे, मन तू क्यों नहीं लेता उनका नाम!
मति रावण की नहीं फिरी थी,
कुल का करना था उद्दार,
बैर लिया दुनिया से उसने,
मृत्यु पाने श्री राम के हाथ,
स्वयं शिव जिनके अनुरागी,
और सखा बने हनुमान,
रे, मन तू क्यों नहीं लेता उनका नाम!
स्वरचित, मौलिक ___
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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