बन ने वाले दो दिन में अपने बन जाते है,
बदलने वाले सालों बाद भी बदल जाते है।
आज और कल के साथी बनते अलग,
कल खिले हुए रिश्ते में, आज न वो महक!
समय का भी रहता अनोखा खेल,
आज और कल सदा बेमेल,
बनने बदलने का खेल ही तो संसार है,
सब जानते है हर तरह से असार है,
है मनुज! कहाँ अस्थायी जगत में स्थायी सुख ढूंढे,
क्यो न शाश्वत सुख की राह को चुने!
सब जानते है सच्ची राह कभी आसान नहीं होती,
पर दृढ़ पुरुषार्थ हो, तो कभी नाकाम नहीं होती।
प्रियंका( पंखी)

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