अपने स्कूल के दिनों में कुरुक्षेत्र या फिर गुरु की कॉपी(ठीक से याद नहीं) की पिछली जिल्द पर एक प्रेरक प्रसंग पढ़ा था, जिसमें महाभारत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् द्वारिका लौटने की अनुमति मांगते श्रीकृष्ण से कुन्ती कहती है कि वह चाहती है कि उसपर विपत्तीयाँ हमेशा आती रहे, क्योंकि जब - जब विपत्तीयाँ आयेंगी तब- तब उसके निवारणार्थ भगवान भी आयेंगे और इस प्रकार उन्हें बारंबार भगवान श्री कृष्ण के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त होता रहेगा l
वर्तमान परिपेक्ष्य में यह तो नहीं ही कहना चाहूँगी कि कोरोना सदृश्य बिमारियाँ या परिस्थितियाँ पुनः कभी किसी युग अथवा काल खण्ड में आये परंतु इस संपूर्ण कोविड काल में रिश्तों की जो पुनर्विवेचना हुई है, नये आदर्श स्थापित हुए है उसे देखते हुए ऐसी परिस्थितियों का उत्पन्न या घटित होना अवश्यक ही जान पड़ता है ताकि हमें उन संबंधों कि महत्ता का ज्ञान हो जो आज के समय में हमें महत्वहीन प्रतीत होने लगे है l
प्राचीन समय में रिश्तों का अलग ही मूल्य था l सतयुग, त्रेता और द्वापर इन सभी युगों में स्वजनों से लेकर समाज तक, इनमें से जाने कितने ही आदर्श चरित्रों के वर्णन न सिर्फ हम आजतक पढ़ते और सुनते चले आये है बल्कि समय समय पर इनसे प्रेरणा भी प्राप्त करते रहे है l
लेकिन नई पीढ़ी के लिए ये सभी प्रसंग और चरित्र परिकथा सदृश हो गए है l आज संबंधों की परिभाषा इस कदर बदल चुकी है कि बच्चों की उत्पति और जन्म अपनी माँ की कोख की बजाय टेस्ट ट्यूब और सेरोगेसी से होने लगी है l बच्चों के लालन- पालन की सभी जिम्मेदारीयाँ आया को निभानी पड़ती है और बृद्ध माता- पिता को केवल वृद्धाश्रम में ही ठौर मिलता है l युवा अब लिव इन रिलेशन में रहते है ,इनके लिए विवाह बंधन की औपचारिकता भी शेष नहीं हैl हर किसी को मित्र अब आस्तींन का सांप मालूम होता है।। परिवार नामक संस्था बस यूँ समझिये कि समाप्ति की कगार पर ही है l
अक्सर सभी चीजों को याद करना सरल नहीं होता और खासकर अच्छी चीजों कोl बाल्यावस्था में फिर भी सीखी हुई बातें हम नहीं भूलते पर जैसे ही हम बड़े होते है, बुद्धिमान होते है, याद रखने के लिए समय- समय पर रिविजन जरुरी हो जाता है,और शायद यही नियम संबंधों पर भी लागू होता है l
कोरोना वायरस की उत्पत्ति से लेकर अब तक ऐसी कई तस्वीरों और घटनाओं से हम रूबरू हुए है जिन्होंने मूल्यहीन और हृदयहीन हो चले समाज को न केवल आईना दिखाया है बल्कि संबंधों पर विमर्श के अवसर के साथ साथ नये मूल्यों से भी परिचित कराया है l
जी हाँ, उन मूल्यों से जिसमें लॉक डाउ न में बेरोजगारी व भुखमरी से जूझते बीमार पिता को एक बच्ची साईकिल पर बैठाकर दिल्ली से दरभंगा तक की लगभग साढ़े ग्यारह सौ किलोमीटर की दूरी अपनी साइकिल के पैडलो से मापते हुए पिता को सुरक्षित घर तक पहुँचाती है l जिसमें एक पलायन करती प्रवासी मजदूर माँ पहियों वाली अटैची पर अपने बच्चे को लिटा मीलों खींच ले जाती है l
वही मूल्य, जिनके लिए अस्पताल और आक्सीजन न मिलने के कारण दम तोड़ते पति को पत्नी मुँह से सांस दे यमराज से पति के प्राण लौटाने सी चेष्टा करती है तो कहीं
अक्सीजन की कमी से दोस्त की सांसे न थम जाये इसलिए आक्सीजन सिलेंडर लेकर बोकारो का एक दोस्त लगभग बारह सौ किलोमीटर की दूरी और पच्चीस टोलो को बिना एक पल गंवाये गाड़ी चलाते हुए 24 घंटे में पार कर नोएडा पहुँच जाता हैl यहाँ तक की सेल(SAIL)
के थके और भूखे मजदूर केवल मृत्यु का ग्रास बनते राष्ट्र को बचाने की जद्दोजहद में और अक्सीजन निर्माण करने हेतु अपने परोसे हुए भोजन से मुँह फेर लेते है l
इस तरह के अनेको उदाहरण भरे पड़े है जिन्होंने मुझे "को बड़ छोट कहत अपराधू" से मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है पर उस घटना का जिक्र न करूँ यह भला कैसे संभव है जिसमें डीएमसीएच आईसोलेशन वार्ड में भर्ती पाँच माह के कोरोना पॉजिटिव बच्चे को भूख से बिलखता देख तमाम मनाही और संक्रमित होने के जोखिम को परे रख "उसकी माँ,उसे स्तनपान कराने लगती है" l
कहते है जल और संबंध दोनों एक से होते है lस्थिरता इन्हें अनुपयुक्त बनाने लगती है पर वही, यदि इनमें गति आ जाए तो फ़िर क्या ऊंचाई, वन, पहाड़, घाटियाँ और मुश्क़िलें? जो भी इनके मार्ग में आते है अशुद्धियाँ और कलुषताएँ हर इन्हें और भी निर्मलता और अनवरतता ही प्रदान करते हैl
अतः इस कोरोना ने हमें एक अवसर दिया है कि हम पुनः अपने संबंधों पर विमर्श करें, रिश्तों का मर्म जाने और न केवल अपने परिवार अपितु समस्त संसार के जीवों के सुख- दुख में भागी बनने का प्रयत्न करें l
-निगम झा
सब इंस्पेक्टर,एस.एस.बी सिलीगुड़ी

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