गतांक से आगे
वीर की शादी गुंडों मौजूदगी में विन्नी के साथ करा दी जाती है।
उसे धमकी दी जाती है कि,"अब तुम फंस चुके हो बाबू,अगर कुछ भी इसके साथ हुआ ,तो बारह के भाव अंदर करा देंगे
बुझे ना ""।
मत सोचिएगा की कोलकता जाकर उहा कुछ करिएगा, तो हमको पता नहीं चलेगा।_ बिन्नी के भाई ने बीर से कहा ।
विवाह के अगले दिन ,वीर को विन्नी के घर के लोगों से मिलवाया गया।
वीर ने अभी तक बिन्नी को देखा भी नहीं था।
अगले दिन सुबह वह बिन्नी को ले कार से कोलकाता रवाना हो गया।
वह बहुत दुखी था,बार बार आत्महत्या के। खयाल आते,एक अज़ (बकरे) की तरह अपने को पा रहा था।जिसका शरीर जबरदस्ती की शादी से तो था ,परन्तु आत्मा तो जैसे निकल गई थी।
रास्ते में जाते समय एक मंदिर पड़ा,ड्राइवर ने कहा भैया जी बहुत प्राचीन मंदिर है ,माता का दर्शन कर लीजिए।
वीर का मन उचट चुका था,संसार ने उसके साथ छल किया ,उसने ईश्वर को ही त्याग दिया।
जब हम पर कोई मुसीबत आती है,तो हम ईश्वर को दोषी मानने लगते हैं।
बहुत कहने पर कि रास्ते में देवस्थान के दर्शन किए बगैर आगे नहीं बढ़ना चाहिए।
वीर कार से उतरा,पीछे पीछे बिन्नी भी उतरी।
इतना शांत ,सुरम्य स्थान,भैरवी और दामोदर नदी के संगम में बसा ये मंदिर ,फिर भी वीर के मन को शांत नहीं कर पा रहा था।
यह एक 6000 साल पहले स्थापित शक्तिपीठ था।यह मंदिर छिन्नमस्तिका देवी को समर्पित है,जो झारखंड का रजरप्पा मदिर कहलाता है।
पुरुष और स्त्री (दामोदर,और भैरवी) नद और नदी का ऐसा संगम इसे रहस्यमय बना रहा था।दोनों ने हाथ ,पैर धुले और प्रसाद लेकर पंक्ति में ,अपनी बारी आने के इंतजार में लग गए।
वीर ने एक बार भी विन्नी का कुशल क्षेम नहीं पूछा था ,वो कैसी है ,प्यासी है ,खुश है या दुखी।
उसे कोई लेना देना नहीं था ,वह बस एक लाश की तरह साथ था।
उनलोगो की बारी आ गई दर्शन की,वे अंदर घुसे,अंदर एक शिलाखंड था, जिसपर मां की तीन आंखे थीं, बायां पैर आगे बढ़ाए कमल पुष्प पर माता खड़ी थीं।और दूसरे पांव के नीचे रति ,कामदेव शयनमुद्रा में थे।
देवी का सर कटा,गले में मुंडमालो के साथ साथ सर्पमाला भी पड़ी थी।
बिखरे केश ,जिह्वा बाहर।दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना ही कटा सर , अगल बगल खड़ी है ,डाकिनी, शाकिनी की मूर्तियां जिसे माता रक्तपान करा रही।
मंदिर पूर्वमुखी था।
उन्होंने दर्शन कर लिया।वे माता के इस स्वरूप को देख चकित और धन्य हो गए।
मंदिर से निकलने के बाद ड्राइवर ने कहा ,सफर लंबा है ,चलिए जलपान कर ले।
फिर वो लोग एक रेस्टुरेंट में गए। मजेदार लोकल व्यंजन धुस्का,पकौड़ी और चाय मंगाई।
वहीं एक व्यक्ति से ड्राइवर ने मंदिर के महामात्य के बारे में पूछा,उस स्थानीय व्यक्ति ने बताना शुरू किया।
यह शक्ति पीठ कामाख्या देवी के बाद भारत का सबसे दूसरा बड़ा शक्ति पीठ है।इस मंदिर को महाभारत कालीन भी माना जाता है। माता के द्वार पर सभी की मनोकामना पूर्ण होती है।उसने पूछा ," आप लोग कोई मनौती मान के पत्थर बांध दीजिए ,पूरा हो जाने के बाद नदी में प्रवाहित कर दीजियेगा,देखिएगा माता अवश्य पूरा करेंगी।
बिन्नी ने ड्राइवर के साथ जा, मंदिर के प्रांगण में पत्थर बांध दिया।
अभी तक वीर को समय नहीं मिल पाया था ,अपने परिवार वालों को इस हादसे वाली शादी के बारे में बताने जा।
उसने सारी बात अपने परिवार वालों को बताई।
तब तक विन्नी आ गई ,और वे निकाल पड़े आगे के अपने सफर पर।
घर पहुंचते उसने देखा , मां आरती की थाली लेकर खड़ी थी।कोई कुछ नहीं कह रहा था।
दुल्हन को अंदर रस्मों के साथ प्रवेश कराया गया।
क्योंकि रात हो चुकी थी ,दोनों को अलग अलग कमरे दिए गए।रास्ते की थकावट इतनी थी कि जल्द ही वीर सो गया।
आधी रात के बाद अचानक हंसी ठहाकों के बीच उसकी नींद खुली।उसे आश्चर्य हो रहा था,इतनी बुरी स्थिति से मै गुजर कर आया हूं ,और सब मेरे सीने के बाद हा,हा,ही ही कर रहे।
वह उठा और अपनी आवाज़ की दिशा में धीरे से बढ़ा।
उसकी आंखे आश्चर्य से फटी रह गईं।ये क्या??? इतना बड़ा धोखा।
विक्रम सिंह,उसके कथित ससुर जी,बिन्नी का भाई,और उसके अपने माता पिता सब बाते कर हंस रहे थे।
तुरंत संभाला खुद को और, तमतमाते अंदर घुसा।
उसे बिन्नी की जगह साड़ी में नेहा दिखी।
उसको देखते सब फिर से ठहाका लगा हंसने लगे।
सबने उसको बताया कि ,तुम काम में इतने मसरूफ थे,तुम्हे बार बार शादी के लिए नेहा कह रही थी ,लेकिन काम का बहाना कर तुम देर कर रहे थे।
नेहा को अपनी थीसिस पूरी करने हावर्ड जाना था।समय कम था तो ये नाटक नेहा के मामा जो वहीं बेगूसराय में रहते थे, उन्होंने किया।वहां इस तरह की पकड़ौवा शादी आम है।
लड़की वाले इतना धमका देते है कि लड़के वाले बेमन से लड़की को अपना ही लेते है और केस नहीं करते।
लेकिन इस तरह शादी को करने को मजबूर होना होता है क्योंकि डॉक्टर,इंजीनियर लड़को का मूल्य उनके अभिभावक करोड़ों में लगा देते हैं।
खैर अब जा कर सो जाओ ,तुम्हारी ये शादी नेहा के साथ हुई है ,और जोर जबरदस्ती एक नाटक था।
उसे नेहा पर बहुत गुस्सा था,जितना उसने इन72 घंटों में सहा था,वो उसकी आत्मा ही जानती थी।नेहा ने कैसे चुप्पी साध रखा ,एक बार तो बता देती ।
खैर जब बात साफ हो गई ,सब खुश थे।
नेहा ने कहा मै हावर्ड जाने से पहले मंदिर में बांधा अपना पत्थर खोल कर आऊंगी,आप चलेंगे पतिदेव 😀😀माता ने चमत्कारों से मेरी झोली भर दी है।
वीर मुस्कुराया ।😀😀😀😀
इस तरह इस डर,घुटन जैसे माहौल का सुखांत हुआ।वीर और नेहा शादी के 10दिनों के बाद अपने अपने कार्यक्षेत्र पर रवाना हो गए।

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