भाग्यवाले ही बचते हैं निकल जाते हैं।
डूब जाती हैं तूफ़ां में अक़्सर कश्तियाँ।।
ईश्वर जब तक चलाये वो चल जाते हैं।
डूबती रहीं अक्सर अहंकार में हस्तियाँ।।
धन के मोह ने इंसा में शैतान भर दिया।
उजाड़ते जलाते हैं गरीबों की बस्तियाँ।।
अश्क़ सूखें या खून का कतरा बन बहें।
बिगड़े दौलतमंदों को करनी है मस्तियाँ।।
कोई अफशोस ना उनको टूटने से कहीं।
चाहे बिखर जाये कितनों की गृहस्थियाँ।।
पढ़ा लिखा अक्षर नहीं अनाड़ी हैं बहुत।
देखे स्कूल नहीं पकड़े न कभी तख्तियाँ।।
जोर ज़ुल्म ही करते रहे हैं ज़िन्दगी भर।
मार काट झगड़े क़त्ल चलाते हैं गोलियाँ।।
ताकत शानो शौक़त रुतबा दिखाता है।
कमजोरों पर ये चलवाता रहा है लाठियाँ।।
रहता है सब यहीं साथ कुछ ना जाता है।
गूँगें लोग भी मरने के बाद देते हैं गालियाँ।।
जीते जी ये प्यास बुझती नहीं इंसान की।
इसी लिए तो नदी में डालते हैं ये अस्थियाँ।।
रचयिता :
डॉ.विनय कुमार श्रीवास्तव

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